सवाल समाज से: कहाँ गई हमारी संवेदना?

आधुनिक हिंदी साहित्य में एक कवि हुए,

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना शायद अपने नाम सुना होगा।  बड़े प्रसिद्ध कवि थे, तो उनकी एक कविता है,

‎गोली खाकर


‎एक के मुँह से निकला—

‎‘राम’।

‎पर दूसरे के मुँह से निकला—

‎‘माओ’।

‎लेकिन तीसरे के मुँह से निकला—

‎‘आलू’।

‎पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है

‎कि पहले दो के पेट भरे हुए थे।

‎यदि आप इस कविता को समझ लेते हैं, तो आप दर्शन (philosophy) को समझने के लिए तैयार हैं। इस कविता का भाव यह है कि आप चाहे राम यानी धर्म के समर्थक हों, या माओ यानी किसी राजनीतिक विचारधारा (वामपंथ/दक्षिणपंथ) के अनुयायी हों। किसी भी विचारधारा, किसी भी दर्शन का समर्थक या विरोधी होने की पहली शर्त है कि पेट भरा होना चाहिए। पेट भरा है तो दिमाग में विचार रहेंगे। पेट खाली है, तो सपना भी रोटी का ही आता है।

‎यह कविता केवल सामान्य संदेश नहीं, बल्कि जीवन की सबसे गहरी सच्चाई उजागर करती है। जब पेट भरा होता है, तब विचारों और राजनीति की मांगें उठती हैं। लेकिन जब पेट खाली हो, तो सबसे पहले रोटी की आवश्यकता सामने आती है। और यहीं से समाज की असली परीक्षा शुरू होती है।

‎दुर्भाग्य यह है कि आज का समाज इस परीक्षा में बार-बार असफल हो रहा है। संगठन और राजनीति हमें धर्म और विचारधारा के नाम पर तो भड़काते हैं, लेकिन भूख और ज़रूरत जैसी बुनियादी सच्चाइयों के सामने वे पूरी तरह नदारद हो जाते हैं। यही से असली विडंबना शुरू होती है।

‎आज का समाज एक विचित्र विरोधाभास से गुजर रहा है। धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संगठन अपने-अपने एजेंडे लेकर हमें लगातार यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि हमारी असली पहचान केवल धर्म, संप्रदाय या संस्कृति से है। वे हमें यह दिखाते हैं कि हमारी ज़िम्मेदारी केवल "अपने" धर्म या अपनी "संस्कृति" की रक्षा करना है, और इसके लिए दूसरे धर्मों, दूसरी जातियों और दूसरी विचारधाराओं के प्रति विद्वेष रखना ज़रूरी है। धीरे-धीरे यह कट्टरता हमारे मन की गहराई में बैठ जाती है और मानवीय संवेदनाएँ, जो हमें इंसान बनाती हैं, कहीं पीछे छूट जाती हैं।

‎हम एक-दूसरे को इंसान मानने से पहले यह पूछने लगे हैं "तुम किस धर्म के हो?", "किस जाति के हो?", "किस विचारधारा के हो?"और इसी प्रश्न के बीच असली प्रश्न गायब हो गया है— "क्या तुम इंसान हो?"।

‎ये संगठन हमारे भीतर ऐसी कट्टरता भरते जाते हैं, पर जब जीवन की असली कठिनाइयाँ सामने आती हैं। जब भूख, मृत्यु या किसी ज़रूरतमंद का सहारा बनने का समय आता है। तो यही संगठन, यही पार्टियाँ, यही तथाकथित रक्षक कहीं नज़र नहीं आते। तब न कोई झंडा, न कोई नारा, न राजनीति, न धर्म आपके साथ खड़ा होता है।

‎यही विडंबना और यही हमारी सबसे बड़ी सामाजिक त्रासदी है। और इसका सबसे मार्मिक उदाहरण है एक घटना, जिसने मुझे भीतर तक हिला कर रख दिया।

‎यह मामला उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के नौतनवा कस्बे के राजेंद्रनगर वार्ड का है, जहाँ दो नाबालिग बच्चे। राजवीर (14 वर्ष) और देवराज (10 वर्ष)। अपने पिता की मृत देह के साथ तीन दिन तक अकेले रहे क्योंकि वे अंतिम संस्कार का खर्च उठाने में असमर्थ थे। पिता बांगड़ी बेचकर घर चलाते थे और लंबे समय से बीमार थे, उनकी मृत्यु शुक्रवार दोपहर हुई, उस समय घर में बेटी भी नहीं थी और न ही आसपास कोई मदद करने वाला। माँ पहले ही नहीं थी और रिश्तेदारों ने भी सहयोग से मना कर दिया। 

‎स्थिति इतनी भयावह थी कि पिता की लाश घर में सड़ने लगी, लेकिन बच्चों के पास लकड़ी खरीदने तक के पैसे नहीं थे। बड़े बेटे राजवीर ने सोचा कि शव को श्मशान घाट ले जाऊँगा तो शायद कोई मदद करेगा, वह किसी तरह एक ठेला गाड़ी का इस्तेमाल करके शमशान घाट तक पहुंचे। लेकिन वहाँ पहुँचने पर उनसे कहा गया कि, अगर जलाना है तो लकड़ी लानी होगी। गरीब और असहाय इन बच्चों के लिए यह असंभव था, और वे अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए दर-दर भटकते रहे।

‎श्मशान घाट पर कुछ नहीं तो वे फिर कब्रिस्तान चले गए। लेकिन वहाँ कहा गया कि तुम्हारे पिता हिंदू हैं, उनका अंतिम संस्कार श्मशान में ही होगा। फिर वे श्मशान लौटे, तो फिर वही जवाब मिला। बेबस होकर दोनों बच्चे सड़क पर भीख माँगने लगे, ताकि लकड़ी खरीदकर पिता का संस्कार कर सकें।

‎सोचिए, दो नन्हें बच्चे, पिता की लाश साथ में लिए, सड़कों पर भीख माँग रहे हों और लोग उनकी तरफ न देखते हों, क्योंकि शव से बदबू आ रही थी।

‎इसी बीच वार्ड कैंडिडेट रशीद कुरैशी और पार्षद वारिस कुरैशी को इस बारे में पता चलती है। उनके पास भी पैसे नहीं थे, लेकिन उन्होंने इधर-उधर से इंतज़ाम किया।

‎पैसे जुटाए, वाहन की व्यवस्था की, शव को मुर्दाघर पहुँचाया और अंत तक बच्चों के साथ रहे।

‎रशीद ने कहा, उन्हें कॉल आया था कि दो बच्चे अपने पिता की लाश लेकर भीख माँग रहे हैं और कोई मदद नहीं कर रहा। यह सुनकर दिल दहल गया। वे तुरंत पहुँचे और बच्चों का सहारा बने।

समाज की विफलता का उदाहरण

‎यहाँ पीड़ा केवल दो बच्चों की लाचारी नहीं है, बल्कि पूरे समाज और व्यवस्था की चुप्पी है। यही चुप्पी हमारी असली विफलता को उजागर करती है।

‎यह घटना समाज में अमानवीयता की सूक्ष्म दरारों को दर्शाती है। जब हमारे बीच मूलभूत मानवता टूट जाती है, तब इस प्रकार की त्रासद घटनाएँ सामने आती हैं।

‎यह घटना हमारे अंतर्मन में गहरी पीड़ा और घृणा तो जगाती है, लेकिन साथ ही यह हमें हमारे समाज की दारुण यथार्थ से भी आँखें खोल देती है।

‎जब एक परिवार गरीबी और अभाव के जाल में फँस जाता है, जब दो नन्हें बच्चे अपने मृत पिता की देह के साथ तीन दिनों तक अकेले रह जाते हैं, तब यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रह जाती। यह हमारे समाज की संवेदना, हमारी संवेदनशीलता और हमारी इंसानियत के साथ-साथ राजनीतिक और धार्मिक वैचारिक ख्याति की विफलता का प्रतीक है।

‎जब एक परिवार इतना गरीब हो जाए कि वे पिता का अंतिम संस्कार तक न कर सकें, तो हमें अपने ढाँचों पर प्रश्न करना होगा। और इस प्रश्न के साथ सबसे बड़ी कसक यह है कि वे संगठन और संस्थाएँ कहाँ हैं, जो खुद को हमारी आस्था और संस्कृति का रक्षक बताते हैं?

‎क्या हमारे विश्व-कोष में प्रेम, संवेदना या अखंड मानवता के लिए कोई जगह बाकी नहीं रही?

‎क्या हमने इतना व्यावहारिक और राजनीतिक रूप धारण कर लिया कि मनुष्य होने की मूल बात मरने वाले को विदा देना भी विलासिता बन गई?

‎यह घटना हमें झकझोरती है। हमारी नैतिकता, हमारी सांस्कृतिक पवित्रता और हमारी सामाजिक न्याय की नींव पर सवाल उठाती है। जब तक हम रोटी, अन्त्येष्टि, सहारा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भी हौसले हार जाएँगे, तब तक राजनीति और धर्म केवल शब्द बनकर रह जाएँगे।

‎कहाँ गए वे तथाकथित धार्मिक संगठन, जो अपने आप को धर्म और संस्कृति की रक्षा करने के लिए प्रदर्शित करते हैं? कहाँ गई वे राजनीतिक पार्टियाँ, जो अपने आप को किसी धर्म विशेष का प्रतिनिधि मानती हैं और दूसरे धर्म के विरुद्ध हमेशा विद्वेष की भावना फैलाकर दोनों समुदायों में लड़ाई करवाती हैं? कहाँ गए वे समाज के लोग, जो अपने सबसे प्राचीन धर्म पर बहुत गर्व करते हैं और उसे सर्वोच्च बताते हैं?

‎ना उनके परिवार के लोग आए,

‎ना समाज आया,

‎ना ही तथाकथित धार्मिक संगठन आए,

‎और ना ही धार्मिक राजनीतिक पार्टियाँ।

‎सामने आया तो केवल एक इंसान जिसके अंदर मानवता थी, जो किसी भी धर्म और संस्कृति से ऊपर था।

‎यहीं असली विरोधाभास है।

‎जहाँ बड़े-बड़े संगठन नदारद रहे, वहाँ एक साधारण व्यक्ति ने साबित किया कि इंसानियत किसी झंडे या किसी पद की मोहताज नहीं होती।

‎अब आप सोचिए—

‎जिनके कहने पर आप भड़क जाते हैं, झंडा लेकर निकल पड़ते हैं, क्या वाकई में वह संगठन या पार्टी आपके लिए है? या फिर वे केवल राजनीति और अन्य लाभ के लिए आपका फायदा उठाते हैं?

‎जब तक आप संपन्न हैं, तब तक उनकी आपके प्रति ज़रूरत है। लेकिन जिस दिन आप ऐसी अवस्था में होंगे, न समाज आपके पास आएगा, न धार्मिक संगठन और न ही धार्मिक राजनीतिक पार्टियाँ।

‎उस समय आपके लिए खड़ा वही होगा जिसके अंदर होगा एक मानवीय आधार। जो किसी भी धर्म और संस्कृति से ऊपर उठकर एक इंसान की मदद करना जानता हो।

‎इस दुखद घटना से उठता है एक आत्मविश्लेषण का प्रतिबिंब: अगर "मानवता" जिंदा नहीं रहेगी, तो "समाज" का क्या मायने रहेगा?

‎हमारी पहचान केवल विचारों या विश्वासों से नहीं बनती, बल्कि उस संवेदना से बनती है, जो भूखों को खाना और मृतकों को विदा दे सके।

‎हमारे समाज का असली स्वरूप उस संवेदना से जाना जाता है। जो भूखे को रोटी बाँटे, मृतक के साथ जाकर अंतिम संस्कार करे और ज़रूरतमंद को उसी वक्त सहायता दे। लेकिन जब यह बुनियादी संवेदना टूट जाती है, जब केवल एजेंडा, शक्ति, लाभ और विभाजन के लिए हम टूटते हैं, तब हम सामाजिक मानवता से स्वतः ही दूर हो जाते हैं।

‎आज यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है:

‎क्या हम सिर्फ विचारों और नीतियों के हिसाब से जी रहे हैं? क्या हमने मानवीय संवेदना को त्याग दिया है क्योंकि वह राजनीति, संस्कृति या धर्म में फिट नहीं बैठती?

‎अगर “मानवता” की नींव न हो, तो कोई “समाज” कैसे बन पाएगा? यदि हम अपने भीतर इंसान होने का अर्थ भूल जाएँ, तो हम सब कुछ खो देंगे।

‎यह घटना हमें मानवता की याद दिलाती है, कि ज़रूरतमंदों के लिए खड़ा होना राजनीति नहीं, धर्म नहीं, कोई विचारधारा नहीं, बल्कि मानवता का मूल कर्तव्य है। ऐसे समय हमें अपनी संवेदना की पहचान से आगे बढ़कर काम करना होगा। क्योंकि यही धार्मिक, सांस्कृतिक और मानवीय रूप से हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

‎इंसानियत बाँटें—क्योंकि यही हमारी असली पहचान है।

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