मोबाइल हमें चला रहा है… या हम मोबाइल को?
एक दिन… जो शायद आपका भी हो सकता है सुबह के 6:30 बजे हैं। अलार्म बजता है। आप आँखें खोलते हैं… और बिना सोचे समझे हाथ सीधे मोबाइल की तरफ बढ़ जाता है। अलार्म बंद। बस यहीं तक काम था… लेकिन उँगली वहीं नहीं रुकती। “चलो, बस एक बार नोटिफिकेशन देख लेते हैं…” व्हाट्सऐप—2 मैसेज इंस्टाग्राम—5 नोटिफिकेशन यूट्यूब—“आपके लिए एक नया वीडियो” और बस… एक मिनट का वो “देखना” कब 25 मिनट में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता। अब आप उठ तो गए हैं… लेकिन दिमाग पहले ही किसी और दुनिया में जा चुका है। --- सुबह की शुरुआत… जो अब हमारी नहीं रही आपने ध्यान दिया है? पहले लोग उठकर आसमान देखते थे, चाय पीते थे, अखबार पढ़ते थे… अब हम उठते ही स्क्रीन देखते हैं। मोबाइल अब सिर्फ एक डिवाइस नहीं रहा— यह हमारी सुबह का पहला “सोचने वाला” बन चुका है। आप क्या सोचेंगे, क्या देखेंगे, किससे तुलना करेंगे— सब कुछ एक एल्गोरिदम तय कर रहा है। और मज़े की बात? हमें लगता है हम खुद चुन रहे हैं। --- “बस 5 मिनट और…” – दिन की सबसे बड़ी झूठी लाइन आपने कितनी बार खुद से कहा है— > “बस 5 मिनट और…” लेकिन सच्चाई ये है… मोबाइल पर “5 मिनट” जैसी कोई चीज़ होती ह...