भारतीय ज्ञान परम्परा (Indian Knowledge System)

 

 

A Book Proposal

 

भारतीय ज्ञान परम्परा

(Indian Knowledge System)

 



 

 

 



A Synopsis of

भारतीय ज्ञान परम्परा

(Indian Knowledge System)

 

भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge System) विश्व की प्राचीनतम और समृद्धतम बौद्धिक परम्पराओं में से एक है। यह केवल धार्मिक या आध्यात्मिक दर्शन तक सीमित नहीं रही, बल्कि जीवन के प्रत्येक पहलू - भौतिक, मानसिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक, गणितीय, सामाजिक और नैतिक को समाहित करती है। वेदों से लेकर उपनिषदों तक, दर्शन से लेकर योग तक, गणित से लेकर खगोल विज्ञान तक न्याय और आयुर्वेद से लेकर वास्तु तक इस परम्परा ने हजारों वर्षों तक मानवता को दिशा दी है। यह सारांश भारतीय ज्ञान प्रणाली के प्रमुख स्तम्भों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास है।

भारतीय ज्ञान परम्परा का स्वर, केवल अतीत की स्मृति नहीं, अपितु सतत प्रवहमान चेतना का प्रतिफल है। यह परम्परा वेदों के ऋचाओं में उपनिषदों के ब्रह्म वाक्यों में, योग, दर्शन की साधना में, गणितीय सूत्रों की सूक्ष्मता में तथा आयुर्वेद के जीवनदायिनी सिद्धान्तों में गहराई से अभिव्यक्त होती रही है।

संस्कृत वाङ्मय  में वर्णित यह परम्परा केवल भाषित या सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि भारतीय दृष्टिकोण से ज्ञान, धर्म, नीति और विज्ञान का समन्वित स्वरूप है। यह परम्परा हमें याद दिलाती है कि भारत में ज्ञान को केवल उपार्जन की वस्तु नहीं माना गया वह “सा विद्या या विमुक्तये” बन्धनों से मुक्त करने वाली विद्या है।

भारतीय ज्ञान परम्परा केवल अतीत की स्मृतियों का बोध नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य को दिशा देने वाली जीवंत चेतना है। यह परम्परा सहस्त्राब्दियों से मानवता के गूढ़तम प्रश्नों का उत्तर खोजती रहीं है- मैं कौन हूँ?  जीवन का उद्देश्य क्या है?  यह ब्रह्मांड कैसे संचालित होता है?  इन प्रश्नों का उत्तर भारतीय मनीषियों ने वेद, उपनिषद, दर्शन, योग, गणित, आयुर्वेद, खगोल, विज्ञान, वास्तु और नाट्य शास्त्र जैसी विविध ज्ञान धाराओं के माध्यम से दिया है।

इस पुस्तक का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों को उस बौद्धिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक धरोहर से जोड़ना है, जिसकी जड़े भारतीय संस्कृति की मिट्टी में गहराई से बैठी हुई हैं। यह परम्परा केवल पुस्तकों में बन्द नहीं रही, बल्कि हमारे आचरण, पर्व, जीवन शैली और भाषा तक बसी हुई है।

वेदों में सृष्टि की जिज्ञासा है, उपनिषदों में आत्मा की खोज।  दर्शनशास्त्र में तर्क और विवेक का विस्तार है, तो योग में चित्त की शुद्धि का मार्ग। गणित और खगोल विज्ञान में भारत ने जो योगदान दिया है, वह आधुनिक विज्ञान की नींव रही है। आयुर्वेद न केवल रोग निवारण की पद्धति है, बल्कि जीवन जीने की कला है।

भारतीय ज्ञान प्रणाली का आधार ही हमारे वेद और उपनिषद है। सैद्धान्तिक विज्ञान की दृष्टि से देखा जाये तो 800 ई.पूर्व में बौधायन ने शूल्बसुत्रा  में वृत्त एवं त्रिभुज के फल का सिद्धान्त प्रतिपादित किया जो रेखागणित में प्रचलित पाइथागोरस प्रमेय से सादृश्य रखता है। आर्यभट्ट प्रथम ने पाँचवीं सदी ईसवी में अपने ग्रन्थ आर्यभट्टीयम में परिधि व्यास अनुपात (π) का सन्निकट मान 3.1416 प्रस्तुत किया, जो एक स्थिरांक है। जिसे आधुनिक युग में पाई के नाम से जाना जाता है। भास्कराचार्य प्रथम ने 600o में  "महाभास्करीयम्" और “लघु भास्करीयम्" में ग्रह की गति, नक्षत्रों की स्थिति तथा खगोलीय घटनाओं की सटीक गणना की तथा आर्यभट्ट के अनिश्चित समीकरण  का पुन: पल्लवन और ज्यामितीय एवं त्रिकोणमिति सिद्धान्तों का उल्लेख किया।

आयुर्वेद के क्षेत्र में औषधि विज्ञान के लिए चरक को चरक संहिता, शल्य चिकित्सा के लिए सुश्रुत संहिता, शरीर रचना के लिए वाग्भट कृत अष्टांगहृदय एवं रसरल समुच्चय वर्तमान एवं भविष्य के लिए उपयोगी रहेंगे। इसके अतिरिक्त माधवकर कृत माधवनिदान, रोगनिन्दन आदि उल्लेखनीय हैं।

वैदिक काल से ही मनुष्य का प्रकृति के साथ तादात्म्य सम्बन्ध रहा है। हमारे ऋषियों ने प्रकृति में एक ऐसे तत्व की अनुभूति की जिसने हमें सामान्य से अलग एक विशिष्ट दृष्टि प्रदान की। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश इन पांच तत्वों से निर्मित माना गया। विभिन्न वैज्ञानिक तथ्यों की चर्चा अनेक ग्रन्थों में मिलती है। अतः यह नितांत आवश्यक तथा युक्ति संगत है कि आधुनिक काल का विज्ञान का अध्ययन करने वाला छात्र अपने देश तथा परम्परा के विकसित ज्ञान-विज्ञान से परिचित हों जिससे वे यह जान सके कि किन विशिष्ट शास्त्र की शाखा में अपने देश का क्या योगदान रहा है।

आजकल विज्ञान के क्षेत्र में अध्ययनरत छात्रों में यह भ्रांति कि आधुनिक विज्ञान केवल पाश्चात्य जगत की ही देन है। इसलिए यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है छात्रों को भारतीय ज्ञान प्रणाली के बारे में तथा भारतीय खोजो से अवगत कराया जाये -

·        कणाद ने 600 ई०पू में वैशेषिक दर्शन में परमाणुवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया और बताया परमाणु अविभाज्य है।

·        आर्यभट्ट ने सर्वप्रथम बताया था कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है और तारे स्थिर हैं, जिसे हजारों वर्ष बाद कैपलर व कापरनिकस ने प्रस्तुत किया।

·        गणित में शून्य की अवधारणा

·        दाशमिक प्रणाली

·        भास्कराचार्य द्वितीय ने 12वीं शताब्दी  में अपने ग्रन्थ "सिद्धान्त शिरोमणि" में पृथ्वी पर स्थित वस्तुओं पर गुरुत्वाकर्षण लागू होने का विवेचन किया।

·        बौधायन ने (8०० ई०पू०) के शुल्ब सूत्र में ज्यामिति का प्रारम्भिक विकास वर्णित है। इन सूत्रों में पाइथागोरस प्रमेय का उल्लेख मिलता है। 

भारतीय ज्ञान प्रणाली में विद्यमान जीवन मूल्यों के साथ-साथ वैज्ञानिक ज्ञान- गणित, खगोल विज्ञान, आदि अन्य सभी विषयों का समागम है। जिसकी उपदेयता आज भी अक्षुण्ण है। भारतीय ज्ञान परम्परा के सिद्धान्तों का समन्वय आधुनिकतम वैज्ञानिक नियमों से किया जा सकता है। इतना ही नहीं इन प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन, अवलोकन व विवेचन करके नए सिद्धान्तों की भी संकल्पना की जा सकती है।

भारतीय ज्ञान प्रणाली में समाहित विषयों और उनकी देन भारत ही नहीं वरन पाश्चात्य जगत भी मानता है। पाश्चात्य गणितज्ञों ने माना है कि गणित में हमारी ज्ञान प्रणाली की अमूल्य देन है जो सर्वप्रथम है और पाश्चात्य जगत के गणितज्ञों ने अपने पुस्तकों में वर्णन भी किया है। गणित ही नहीं वरन् भारतीय दर्शन को भी सर्वश्रेष्ठ माना है।

प्रो० मैक्समूलर ने कहा है कि-

"भारत में दर्शन का अध्ययन मात्र ज्ञान प्राप्त करने के लिए नहीं, वरन जीवन के चरम उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया जाता हैं।"

भारतीय दर्शन में षड़दर्शन - सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेन्दात प्रमुख है। ये दर्शन प्रणाली जीवन, आत्मा और ब्रह्म के स्वरूप का विवेचन करती है। न्याय और वैशेषिक दर्शन में तर्क और पदार्थ विज्ञान की झलक मिलती है, तो सांख्य और योग में आत्मा परमात्मा के बीच की चर्चा होती है। वेदान्त दर्शन इन सभी को आत्मसात का अद्वैत दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

भारतीय ज्ञान प्रणाली, भारत ही नहीं वरन् अरब देशों के माध्यम से यूरोप पहुंचा। गणित की खोज, अरब के लोग भी सर्वप्रथम भारत में हीं मानते है। ख्वारिज़्मी  ने ब्रहमगुप्त और आर्यभट के कार्यो का अरबी में अनुवाद किया, जिससे "अल्गोरिदम" और बीजगणित (Algebra) जैसे शब्द उत्पन्न हुये । फिबोनाची ने भारतीय अंको और दशमलव प्रणाली को यूरोप में लोकप्रिय बनाया जिससे पुनर्जागरण काल में वैज्ञानिक और वाणिज्यिक विकास सम्भव हुआ।

भारतीय गणित की परम्परा केवल ऐतिहासिक महत्व की नहीं, यह आज वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और शिक्षा में प्रासंगिक है। हमारी समृद्ध ज्ञान प्रणाली हमें यह सिखाती है  कि ज्ञान का उद्देश्य केवल तकनीकी दक्षता नहीं बल्कि जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझना और समाज के कल्याण के लिए उसका उपयोग करना है।

हमें पुन प्राचीन भारत की शिक्षा पद्धति को जागृत करने की आवश्यकता है जो 'सा विद्या या विमुक्तये' के सिद्धान्त पर आधारित थी। जबकि वर्तमान व्यवस्था केवल व्यावसायिक सिद्धान्तों पर आधारित होकर कृत्रिमता से चारों ओर आच्छादित हो गई हैँ।  हमें अपनी ज्ञान परम्परा को पुनः जागृत करना होगा जैसे की नालन्दा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विश्व विद्यालयों में प्रचलित थी। प्राचीन सिद्धान्तों को अपनाकर हमे यह विचार करना होगा की शिक्षा को किस प्रकार ज्ञानोन्मुख, मूल्यनिष्ठ व रोजगारोन्मुख बनाया जा सके।

उपनिषद ज्ञान की अमूल्य निधि है। उपनिषदों में प्रतिपादित सृष्टि उत्पत्ती सिद्धान्त, तैत्तिरीय उपनिषद का पंचकोश सिद्धान्त, यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे का सिद्धान्त, नवीन व वैज्ञानिक अवधारणाएं प्राप्त होती है।

ऋषि मनु के अनुसार-

“सभी जीव अपनी पुरानी पीढ़ियों के जीवित रहने की क्षमता को अपनाकर आगे बढ़ते रहे।"

16वीं शताब्दी के वैज्ञानिक डार्विन ने इसे डार्विनवाद प्रणाली का नाम दिया।

ज्यामिति के कई महत्वपूर्ण नियमों की खोज बौधायन द्वारा, शून्य तथा दशमलव प्रणाली का उद्भव भारत में हुआ,  महर्षि भारद्वाज का विमान शास्त्र, वेदांग ज्योतिष में सूर्य की गति और काल निर्धारण से सम्बंधित नियम, भास्कराचार्य द्वारा गुरुत्वाकर्षण का उल्लेख करना , महर्षि कणाद द्वारा परमाणुवाद सिद्धान्त का प्रतिपादन , वेदान्त दर्शन में पंचीकरण की प्रक्रिया द्वारा सृष्टि उत्पत्ति का वैज्ञानिक विवेचन, अगस्त्य संहिता में आश्चर्यजनक रूप से विद्युत उत्पादन सम्बन्धी सूत्रों का मिलना तथा करोड़ों  पांडुलिपियाँ आज भी शोध का इंतजार कर रही है ताकि भारतीय ज्ञान विज्ञान की परम्परा को उसका यथोचित स्थान मिल सके।

इसके अतिरिक्त प्राचीन वास्तुशास्त्र, प्राचीन कृषि, विषयक ग्रन्थ जैसे – कृषि पाराशर, वृक्षायुर्वेद का भी वर्तमान आवश्यकताओं के अनुकूल प्रयोग किया जाना चाहिए।

सार रूप में कहा जाए तो याकोबी, मैक्समूलर, विलियम जोन्स, मोनियर, अलेक्जेंडर कनिंघम आदि विदेशी विद्वानों ने भारतीय संस्कृति का अध्ययन किया तथा नासा (NASA) जैसे संस्थान हमारे ग्रंथों व परम्पराओं का अध्ययन कर समृद्ध हो रहे है। किन्तु हमारा स्थिति उस कस्तूरी मृग के समान है जो स्वयं की सुगंध से अनभिज्ञ है।

प्राचीन भारतीय सनातन ज्ञान परम्परा अति समृद्ध थी तथा  इसका उद्देश्य धर्म अर्थ और मोक्ष को समाहित करते हुए  व्यक्ति  के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को विकसित करना था। जब सारा विश्व अज्ञान रूपी अहंकार में भटकता था तब सम्पूर्ण भारत के मनीषी उच्चतम ज्ञान का प्रचार करके मानव को पशुता से मुक्त कर श्रेष्ठ संस्कारों से युक्त कर सम्पूर्ण मानव बनाते थे।

"संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मानसि जानताम् देवा भागं यथा पूर्व सजनाना उपासते"

- ऋग्वेद (10.191.2)

मनुष्यों में अलग-अलग दल न होने चाहिए, किन्तु सब मिलकर एक सूत्र में बँधें, मिलकर रहें, इसलिए मिलें कि परस्पर संवाद कर सकें, एक-दूसरे के सुख-दुःख और अभिप्राय को सुन सकें और इसलिए संवाद करें कि मन सब का एक बने-एक ही लक्ष्य बने और एक लक्ष्य इसलिये बनना चाहिये कि जैसे श्रेष्ठ विद्वान एक मन बनाकर मानव का सच्चा सुख प्राप्त करते रहे, ऐसे तुम भी करते रहो।

साथ चलने एक स्वर में बोलने और एक दूसरे के मन को जानने वाला समाज ही अपने युग बेहतर बनाने की सामर्थ्य से युक्त हो सकता है और ऐसे युग में जीने वाले स्वयं के लिए बेहतर वर्तमान और आने वाली पीढीयों के लिए बेहतर भविष्य की संकल्पना करने वाले होते हैं। ऋग्वेद का यह मन्त्र हमें ऐसे ही सनातन दृष्टि को प्रदान करने वाला है।

यह भारत भूमि महान है। इस भूमि की ज्ञान की अविरल धारा सम्पूर्ण जगत को सींचा है। भारतीय ज्ञान परम्परा पुरातन युग से बहुत समृद्ध रही है। भारतीय ज्ञान परम्परा के समृध्द्धशाली होने का प्रमाण खुद विश्व ने भी माना है। बीते कुछ शताब्दियों में इस भूमि को इस प्रकार महसूस कराया जाता रहा है कि यहां कभी ज्ञान अंकुरित नहीं हुआ है। सहस्त्र वर्ष की दासता में हमारी संस्कृति की सैकड़ों पीढ़ियों ने पीड़ा झेलते  हुये इस ज्ञान को सजाएं रखा परन्तु इसकी उपदेयता क्षीण होती रही। इसलिए, समय है भारत अपनी ज्ञान वृक्ष की छाया में पोषित हो रहे विश्व को की भारत का गुरुत्व अभी कायम है।

मैकाले के मानस पुत्र प्रश्न उठाते है कि भारत ने विश्व को क्या दिया और यह बोध कराते है की पाश्चात्य देशों ने ही भारत को सब कुछ दिया है। भारत ने विश्व को ज्ञान प्रणाली दी, विज्ञान के अनेक आयाम दिये। यह भारत और भारतीय ज्ञान परम्परा के बारे में चिंतन करने का सही समय है। उसकी अदेयता को जनमानस तक पहुचने के लिए पुरुषार्थ की आवश्यकता है।  क्योंकि केवल यह पुरातन के लिए नहीं है। यह बुद्धि, आन्तरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय गौरव के बारे में है।

आधुनिक युग में डिप्रेशन, तनाव व  मेन्टल ट्रामा जैसे शब्दों का अत्यधिक प्रयोग बढ़ रहा है। आज की युवा पीढी पाश्चात्य जगत  की जीवन शैली को अपनाने के कारण इन शब्दों को अपने जीवन में समाहित कर चुके हैं। किन्तु पुरातन भारत में इस प्रकार की मनोवृत्ति देखने को नहीं मिलती थी।  इसका कारण भारतीय दर्शन है। अतः यह हम सभी का कर्तव्य बनता है कि भारत वर्ष की अनमोल धरोहर, ज्ञान को संवर्धित करके रखें, जिससे कि विश्व का कल्याण हो सके एवं भारत की आने वाली पीढ़ी, भारत को हीन दृष्टि से न देखकर गौरव  पूर्ण दृष्टि से देखे।

वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन ने कहा है –

"हम भारतीयों के बहुत ऋणी है जिन्होंने हमें गिनना सिखाया। जिसके बिना कोई सार्थक, वैज्ञानिक खोज नहीं हो सकती थी।"

पाश्चात्य जगत के वैज्ञानिक के कथन से यह स्पष्ट होता है कि भारत वर्ष का योगदान सदैव ही अमूल्य रहा है और आधुनिक सन्दर्भ में इसकी उपदेयता सदैव अक्षुण्ण रहेगी।

प्राचीन भारतीयों द्वारा आविष्कृत विचारों और तकनीकीयों का योगदान देकर आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी की मूलाधार को दृढ़ करने की में अद्भुत योगदान रहा है। जबकि इन अभिनव योगदान को वर्तमान में कुछ तो अपनाया जा रहा है कुछ अभी भी अज्ञात है।

भारतीय ज्ञान परम्परा केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि, वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शक है। इसकी वैज्ञानिक दृष्टि, आध्यात्मिक गहराई और व्यवहारिक वुद्धिमता आज की शिक्षा, चिकित्सा, प्रौद्योगिकी और मानव कल्याण की प्रेरणा स्त्रोत है। भारत ने ही विश्व को बौद्ध, जैन और सिक्ख पंथ दिये । भारत ने विश्व को गुरू शिष्य परम्परा दी जिसके माध्यम से वर्षों तक अर्जित  ज्ञान को आत्मसात और विश्लेषण कर नये ज्ञान को संष्लेसित  किया गया।

 

यह पुस्तक “भारतीय ज्ञान परंपरा” एक ऐसी परंपरा है जो हजारो वर्षो से वैज्ञानिकता, आध्यात्मिकता और व्यवहारिकता जीवन का समन्वय करती आई है, को समर्पित है। इस पुस्तक में वैदिक युग से लेकर आधुनिक युग तक भारतीय ज्ञान धाराओं जैसे गणित आयुर्वेद, खगोलशास्त्र, योग, वास्तु, नाट्यशास्त्र, शिक्षा पद्धति और दर्शन को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।

 

पुस्तक का उद्देश्य न केवल पाठकों को भारत की प्राचीन बौद्धिक परम्पराओं से परिचित कराना बल्कि यह भी है बताना है कि ये ज्ञान में कितने प्रासंगिक और उपयोगी हैं। इसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ ऐतिहासिक सन्दर्भ, प्रमुख ग्रन्थ की समीक्षा, महान आचार्य का योगदान व वर्तमान शैक्षिक प्रणाली में इनका समावेशन कैसे किया जा सकता है, इस पर भी विचार किया गया है।

 

इस पुस्तक में यह बताया गया है कि किस प्रकार भारतीय ज्ञान प्रणाली जीवन के समग्र दृष्टिकोण को अपनाती है, जिसमे भौतिक और आध्यात्मिक विकास का सन्तुलन प्रकृति के साथ सहअस्तित्व और ज्ञान के विविध क्षेत्रों के बीच समन्वय प्रमुख है।

 

साथ ही, यह पुस्तक आज के समय में Indian Knowledge System की प्रासंगिकता, विशेष रूप से शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार में इसकी भूमिका को रेखांकित करती है।

नई शिक्षा नीति (NEP2020) में भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा में एकीकृत किया जा रहा है जिससे विद्यार्थी मौलिक सोच और वैश्विक ज्ञान के साथ भारतीय दृष्टिकोण से भी परिचित हो सके।

 

आज जब विश्व एक बार फिर से भारत की ओर आध्यात्मिक समाधान और प्राकृतिक संतुलन की आशा से देख रहा है, तब यह आवश्यक है कि हम अपनी परम्परा को नए दृष्टिकोण से देखे - गर्व,  गम्भीरता और गहराई के साथ।

 

यह पुस्तक उसी पुनर्जागरण का छोटा प्रयास है। इसमें प्राचीन ग्रन्थों की व्याख्या के साथ - साथ उनके आधुनिक प्रासंगिक सन्दर्भों को भी प्रस्तुत किया गया है। मेरा विश्वास है कि यह कार्य पाठकों को अपनी जड़ों से जोड़ने और चिंतन को प्रेरित करने का माध्यम बनेगा। आपका सहयोग, संवाद और सुझाव इस यात्रा को और भी समृद्धि बनाएंगे।

 


विषय-सूची

 

अध्याय 1. भारतीय ज्ञान प्रणाली का परिचय

·        भारतीय ज्ञान प्रणाली की परिभाषा

·        इसका समग्र दृष्टिकोण

·        पाश्चात्य ज्ञान और भारतीय ज्ञान में अन्तर

अध्याय 2. वेद, उपनिषद और वेदांग

·        वेदों की संरचना और उद्देश्य

·        उपनिषदों का दार्शनिक पक्ष

·        वेदांगों की भूमिका (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुतत्त, छन्द, ज्योतिष)

अध्याय 3. दर्शन की परम्परा

·        षड्दर्शन : सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेन्द्रात

·        बौद्ध, जैन और चार्वाक दर्शन की झलक

·        तर्क विश्लेषण और आत्मबोध

अध्याय 4. भारतीय परम्परा में गणित

·        गणित शास्त्र का अर्थ तथा उद्भव

·        गणित शास्त्र का क्रमिक विकास (वैदिक, शुल्व, वेदांग तथा शैशव काल)

·        शून्य से दशमलव तक

·        π की खोज

·        बीजगणित, त्रिकोणमिति का विकाश

·        गणित शास्त्र में आचार्य परंपरा

·        आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, ब्रहमगुप्त एवं रामानुजन

 

अध्याय 5. आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा

·        चरक और सुश्रुत संहिता

·        पंचमहाभूत सिद्धांत

·        योगसूत्र और आठ अंग

·        समकालीन स्वास्थ्य चुनौतियों में उपयोगिता

अध्याय 6. कला, संगीत और नाट्यशास्त्र

·        भरतमुनि का नाट्यशास्त्र

·        संगीत और राग- रचना की वैज्ञानिकता

·        शिल्पशास्त्र और सौन्दर्यशास्त्र

अध्याय 7. वास्तु और स्थापत्य

·        वास्तु शास्त्र के सिद्धान्त

·        मन्दिर, घर, नगर नियोजन

·        ऊर्जा सन्तुलन और प्रकृति - संगति

अध्याय 8. समाज, नीति और तर्कशास्त्र

·        मनुस्मृति, नीतिशास्त्र और कौटिल्य का अर्थशास्त्र   

·        सामाजिक व्यवस्था, धर्म और कर्तव्य

·        समृद्धि और नैतिक अर्थ नीति

अध्याय 9. भारतीय ज्ञान प्रणाली और नई शिक्षा नीति (NEP 2020)

·        IKS का शैक्षिक पुनर्संयोजन

·        पाठ्यक्रम के समावेश के उदाहरण

·        शिक्षक की भूमिका

·        शोध व नवाचार के अवसर

 

अध्याय 10. वैश्विक संदर्भ  में भारतीय ज्ञान प्रणाली

·        योग दिवस- आयुर्वेद की वैश्विक मान्यता

·        अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और अध्ययन केन्द्र

·        IKS के माध्यम से सांस्कृतिक कूटनीति

 

निष्कर्ष

·        भारतीय ज्ञान प्रणाली की निरन्तरता और समकालीनता

·        इसे जीवंत बनाये रखने का उपाय

·        शोध, नवाचार और युवाओं की भागीदारी

 

परिशिष्ट (Annexure)

·        प्रमुख ग्रन्थों की सूची

·        संसाधन केन्द्रों की जानकारी

 

 


अध्याय – 1

भारतीय ज्ञान प्रणाली

 

भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge System) उन समृद्ध परम्पराओं, सिद्धांतों, अनुभवों और जीवन दृष्टियों का समुच्चय है जो भारत में हजारों वर्षों से विकसित हुई हैं। यह प्रणाली विज्ञान, गणित, खगोल शास्त्र, चिकित्सा (आयुर्वेद), दर्शन, कला, वास्तु संगीत, योग, कृषि, नीतिशास्त्र, शिक्षा एवं साहित्य जैसे अनेक क्षेत्रों में गहन और सुसंगत ज्ञान प्रदान करती है। यह ज्ञान केवल शास्त्रों में निहित है, बल्कि जनजीवन, लोक परम्पराओं और आचरण में भी समाहित है।

भारतीय ज्ञान प्रणाली एक ऐसी प्रणाली है जो भारतीय संस्कृति, ऐतिहासिक धाराओं और परम्पराओं के आधार पर विकसित हुई है। इस प्रणाली के अन्तर्गत, ज्ञान को  धारण करने का एक विशेष तरीका होता है जो भारतीय समाज के सामाजिक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को ध्यान में रखता है। यह प्रणाली भारतीय जीवन - शैली और आदर्शों को प्रेरित करने का एक माध्यम भी है जो छात्रों  को समृद्ध और सात्विक जीवन की ओर प्रोत्साहित करता है। भारतीय ज्ञान प्रणाली में, शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं किया जाता बल्कि विशेष ध्यान दिया जाता है कि छात्रों को उनकी स्वाभाविक प्रतिभा, क्षमताओं और रुचियों के अनुसार विकसित किया जाए।

भारतीय ज्ञान प्रणाली ज्ञान के प्रवाह की एक जीवंत धारा है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निरंतर प्रवाहित होती रहती है। यह ज्ञान हस्तांतरण की एक सुव्यवस्थित और सुदृढ़ प्रणाली है। परंपरागत वैदिक साहित्य, जैसे कि उपनिषद, वेद और उपवेद, भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण और आदिकालीन स्रोत माने जाते हैं, लेकिन यह प्रणाली ज्ञान के विविध आयामों को समेटे हुए है।

भारतीय दर्शन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत 'वसुधैव कुटुम्बकम्' है, जिसका अर्थ है "संपूर्ण विश्व एक परिवार है।" यह उदात्त विचार उपनिषदों से लिया गया है और भारतीय चिंतन की व्यापकता को दर्शाता है। इसी विश्व-बंधुत्व की भावना को आगे बढ़ाते हुए, भारतीय ज्ञान प्रणाली 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' जैसे कल्याणकारी श्लोकों के माध्यम से पूरे विश्व के सुख और शांति की कामना करती है। यह श्लोक 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के आदर्श का एक सुंदर और व्यावहारिक उदाहरण है:

“सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत।“

यह विशिष्ट भावना भारत की एक अमूल्य देन है। यही कारण है कि भारत सदैव मानव कल्याण के लिए तत्पर रहने वाला और सहयोग करने वाला राष्ट्र रहा है।

 

भारतीय ज्ञान परम्परा की समग्र दृष्टिकोण -

भारतीय ज्ञान प्रणाली का मूल दृष्टिकोण "समग्रता" (Holism) पर आधारित है। यह मानव, प्रकृति और ब्रह्मांड को एक अद्वितीय, अविभाज्य सत्ता के रूप में देखती है। यह परम्परा समाज और संस्कृति की गहराई से निःसृत है। भारत की सांस्कृतिक धारा सदा से समावेशी, करुणामूलक और समतामूलक रही है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में सामासिकता का भाव निरन्तर प्रवाहित होता रहा है। यही सामासिकता भारत की राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान बनती है, जो सम्पूर्ण देश को एकता और अखंडता के सूत्र में बांधती है।

जैसा कि कवि धूमिल कहते हैं—

“कि भूखा रहकर भी आदमी
अपने हिस्से का आकाश
मुस्कुराते हुए ढोता है,
अपने देश की मिट्टी को
आँख की पुतली समझता है।“

 

भारतीय ज्ञान परम्परा बहुत समृद्ध रही है। इसका अतीत स्वर्णिम रहा है। भारत का अतीत इतना गौरवशाली रहा है कि वह दुनिया की जिज्ञासा का केन्द्र रहा है। यही कारण है कि इस देश में पूरी दुनिया से लोग आयें, रच बस गये और यह क्रम आज भी गतिमान है। यहां प्रवास के क्रम में उन लोगों ने बहुत कुछ सीखा और अपने देश जाकर उसे अपनी भाषा में अनुवाद कर अपने देश की परम्परा को समृद्ध किया जबकि उस ज्ञान का मूल उद्गम भारत ही रहा है।

हिन्दी के प्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद ने कहा-

“अरुण यह मधुमय देश हमारा।

जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।“

 

भारत सदैव एक स्वागत योग्य भूमि रही है, जहाँ विभिन्न जाति-धर्म और संस्कृतियों के लोग आए, बस गए और अपने जीवन का विस्तार किया। शक, हूण, पठान, तुर्क, मुगल और अंग्रेज़ जैसे आक्रमणकारियों ने इस धरती पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कुछ ने यहाँ के संसाधनों और लोगों को बर्बरता से लूटा और कुचला, तो कुछ ने ज्ञान और संस्कृति के समृद्ध भण्डारों को नष्ट करने की कोशिश की। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय, जो न केवल हमारे लिए बल्कि पूरे विश्व के लिए ज्ञान के केन्द्र थे, को जलाकर तहस-नहस कर दिया गया। यदि ये ग्रन्थागार आज भी संरक्षित होते, तो हमारा राष्ट्र प्रगति के शिखर पर होता और हम विश्वगुरू के रूप में पूरे विश्व में प्रतिष्ठित होते।

भारतीय ज्ञान परम्परा को बचाने में ऐसे संत, कवि और चिंतक हुए, जिन्होंने मनुष्य की जिजीविषा को जीवित रखने के लिए मृत्यु के भय को परास्त किया और रामराज्य की अवधारणा दी। उन्होंने तत्कालीन शासन व्यवस्था के सामने यह प्रस्ताव रखा—

"ऐसा चाहूं राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न,
छोट-बड़ो सब सम बसे, रविदास रहे प्रसन्न।"

यह समग्र परंपरा बुद्ध के "अप्प दीपो भव" अर्थात ‘आप अपना प्रकाश स्वयं बने’ के सिद्धांत से पूर्णतया मेल खाती है। इसी कारण भारत की ज्ञान परंपरा कभी सुप्त नहीं रही; इसके केंद्र में सदैव प्रकृति, पर्यावरण और मनुष्य रहे हैं।

भारत के लोग अत्यंत गतिशील, सृजनशील और नवाचारी हैं। वे न केवल नया सृजन कर सकते हैं, बल्कि अन्य भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान का अनुवाद कर उसे आत्मसात भी करते हैं। संस्कृत, पालि, प्राकृत और अपभ्रंश जैसे समृद्ध साहित्य से भी वे ज्ञान अर्जित करने में समर्थ हैं।

भारतीय ज्ञान का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा मौखिक परंपरा में निहित है, जिसे राष्ट्रहित में संकलित कर विकास में उपयोग किया जा सकता है। जब विश्व की कई प्राचीन सभ्यताएँ समय के प्रवाह में विलीन हो गईं, तब भी भारत की बौद्धिक परंपरा और सांस्कृतिक चेतना आज तक जीवंत और निरंतर प्रवाहित है।

मोहम्मद इकबाल के शब्दों में—

 

“यूनान ओ मिस्र ओ रूमा सब मिट गए जहाँ से

अब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमारा

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा”

 

सारी दुनिया हमें अपना विरोधी मानती रही, फिर भी हम 'वसुधैव कुटुम्बकम' के सिद्धांत पर अडिग रहे।

धर्म, दर्शन, अध्यात्म, आयुर्वेद, योग और अन्य अनेक अमूल्य देनें भारत ने विश्व को दी हैं। चरक और सुश्रुत जैसे महान आचार्यों से लेकर वेद, उपनिषद, स्मृतियाँ, महाभारत और रामायण तक — ये सभी भारतीय ज्ञान की आधारशिला हैं। बौद्ध और जैन परंपराओं ने इस बौद्धिक धरोहर को और भी समृद्ध किया।

मध्यकाल में यह परंपरा भक्ति आंदोलन के रूप में पुनः जाग्रत हुई। संतों की वाणी ने समाज में चेतना का संचार किया — “संतो भाई, आई ज्ञान की आंधी रे” जैसे उद्घोषों ने ज्ञान की निरंतर धारा को जन-जन तक पहुँचाया। यही चेतना स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय नवजागरण में भी प्रकट हुई।

इन सभी आंदोलनों — भक्ति, स्वतंत्रता संग्राम और नवजागरण — के बीच गहरा पारस्परिक संबंध स्पष्ट दिखाई देता है। यह निरंतरता इस बात का प्रमाण है कि भारत की ज्ञान परंपरा कभी स्थिर नहीं रही, बल्कि काल के प्रत्येक प्रवाह में सक्रिय और सजीव रही है।

हिन्दी के महाकवि मैथिलिशरण गुप्त ने 'भारत भारती' में कहा है—

 

“शैशव-दशा में देश प्रायः जिस समय सब व्याप्त थे,
निःशेष विषयों में तभी हम प्रौढ़ता को प्राप्त थे।
संसार को पहले हमने ज्ञान-भिक्षा दान की,
आचार की, व्यवहार की, व्यापार की, विज्ञान की॥“

 

इच्छा और ज्ञान को रूप देना (Desire, Knowledge & Action) — यही वह मूल मंत्र है जो भारत की मेधा को विश्व से अलग पहचान दिलाता है। भारत की मेधा (प्रतिभा) पूरी दुनिया को संचालित करने के लिए पर्याप्त और सक्षम है।

 

जयशंकर प्रसाद के शब्दों में—

“शक्ति के विद्युत्कण, जो व्यस्त विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;
समन्वय उसका करें समस्त, विजयिनी मानवता हो जाए।“

 

भारतीय ज्ञान प्रणाली ने विश्व कल्याण का जो मंत्र दिया है — शांति, करुणा, दया, भ्रातृत्व और सहयोग का — वह पूरी दुनिया को जोड़ने का कार्य करता है। इस परंपरा का सजीव क्रियान्वयन हमें कोविड-19 महामारी के दौरान भी देखने को मिला, जब भारत विश्व के कल्याण के लिए आगे आया।

हमें अपनी ज्ञान परंपरा को जानना, पहचानना और उसे राष्ट्र निर्माण तथा मानव कल्याण के लिए प्रभावी रूप से प्रयोग करना चाहिए। भावी पीढ़ी, विशेषकर युवा वर्ग, इस संकल्प को आत्मसात करे और इस पर गर्व महसूस करे। भारतीय ज्ञान प्रणाली सदैव सतत और सनातन रही है।

 

पाश्चात्य और भारतीय ज्ञान परम्परा में अन्तर -

विश्व की विभिन्न सभ्यताओं ने अपने-अपने अनूठे तरीकों से ज्ञान की खोज, संचयन और संवर्धन किया है। इनमें दो प्रमुख ज्ञान परम्पराएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं — पाश्चात्य (Western) और भारतीय (Indian) ज्ञान परम्परा। यद्यपि दोनों का मूल उद्देश्य सत्य की खोज है, परन्तु इनके दृष्टिकोण, पद्धतियां, मूलभूत धाराएँ तथा अंतिम लक्ष्य में गहन एवं मौलिक भिन्नताएँ विद्यमान हैं।

सर्वप्रथम यदि हम ज्ञान के उद्देश्य की बात करें, तो पाश्चात्य ज्ञान परम्परा मुख्यतः भौतिक जगत को समझने, नियंत्रित करने और उससे सुख-सुविधा प्राप्त करने पर केंद्रित रही है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के माध्यम से मानव जीवन को अधिक आरामदायक, सुगम और तकनीकी दृष्टि से उन्नत बनाना इसका प्रमुख लक्ष्य रहा है। इसके विपरीत, भारतीय ज्ञान परम्परा आत्मा, ब्रह्म और जगत के अंतर्निहित सम्बन्ध को समझने की गहन आकांक्षा रखती है। इसका अंतिम उद्देश्य आत्मबोध, चेतना का उन्नयन और मोक्ष— अर्थात जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति—प्राप्ति है।

ज्ञान के स्रोतों के संदर्भ में भी दोनों परम्पराओं में स्पष्ट अंतर है। पाश्चात्य परम्परा मुख्यतः इन्द्रिय, अनुभव, तर्क, अवलोकन और प्रयोग पर आधारित है तथा इसके लिए वैज्ञानिक विधियों और प्रायोगिक प्रमाणों का प्रयोग करती है। वहीं भारतीय परम्परा ज्ञान के चार प्रमुख प्रमाणों — प्रत्यक्ष (इन्द्रिय अनुभव), अनुमान (तर्क), उपमान (सादृश्य) और शास्त्र (श्रुति एवं स्मृति) — को मान्यता देती है। यहाँ ज्ञान केवल बाहरी जगत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आंतरिक अनुभूति, ध्यान, योग, तपस्या और आत्मचिंतन के माध्यम से भी ज्ञान प्राप्ति संभव मानी जाती है।

 

दृष्टिकोण की दृष्टि से, पाश्चात्य परम्परा अधिक विश्लेषणात्मक, खण्डित और तकनीकी रही है, जो समस्याओं को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटकर समझने का प्रयास करती है। इसके विपरीत, भारतीय दृष्टिकोण समग्र (Holistic) है, जिसमें जीवन, प्रकृति, आत्मा, समाज और ब्रह्मांड को एक अविभाज्य और परस्पर जुड़े हुए तंत्र के रूप में देखा जाता है। उदाहरण स्वरूप, भारतीय दर्शन के ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ और ‘तत्त्वमसि’ जैसे महत्त्वपूर्ण सूत्र व्यक्ति और संसार की एकता एवं अखंडता को प्रतिपादित करते हैं।

 

शिक्षा और अध्ययन की पद्धतियों की दृष्टि से भी दोनों परम्पराएँ भिन्न हैं। पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली अधिक औपचारिक, संस्थागत और रोजगार-केंद्रित रही है, जहाँ शिक्षा का लक्ष्य तकनीकी दक्षता और उत्पादकता बढ़ाना होता है। इसके विपरीत, भारतीय शिक्षा प्रणाली गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित है, जहाँ शिक्षा न केवल ज्ञान अर्जन, बल्कि चरित्र निर्माण, आत्मानुशासन और जीवन मूल्यों के विकास की प्रक्रिया है। यहाँ शिक्षा को साधना माना जाता है, न कि मात्र सूचना या तथ्यों के संकलन के रूप में।

 

पाश्चात्य दृष्टिकोण के अनुसार, मानव प्रकृति का स्वामी है; जबकि भारतीय दृष्टिकोण में प्रकृति पूजनीय है (पृथिवी माताः)। मानव और प्रकृति के सहअस्तित्व में गहन विश्वास रखा जाता है। भारतीय परम्परा में प्रकृति को माता के रूप में पूजा जाता है (माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:), और इसी भाव से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे विश्वबोधक विचारों का जन्म हुआ है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि पाश्चात्य ज्ञान परम्परा ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी और भौतिक समृद्धि के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है, परन्तु इसका दृष्टिकोण अधिक भौतिकवादी और वस्तुनिष्ठ रहा है। वहीं भारतीय ज्ञान परम्परा आध्यात्मिक, नैतिक और समग्र जीवन दृष्टि पर आधारित है। दोनों परम्पराओं के अपने-अपने महत्त्व हैं और यदि आज के युग में इनके श्रेष्ठ पक्षों का समन्वय संभव हो, तो मानवता एक संतुलित, समृद्ध और शांतिपूर्ण मार्ग पर अग्रसर हो सकती है।

 

आज के वैश्विक संकटों — जैसे जलवायु परिवर्तन, मानसिक तनाव, सामाजिक असमानता — को देखते हुए भारतीय दृष्टिकोण अधिक प्रासंगिक एवं उपयुक्त प्रतीत होता है। पाश्चात्य विज्ञान की तकनीकी प्रगति और भारतीय ज्ञान परम्परा के जीवन मूल्यों का संयोजन एक संतुलित, समन्वित और समृद्ध विश्व की रचना कर सकता है। इसलिए, इन दोनों परम्पराओं का सामंजस्य और समन्वय आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

 

 

 

 

 

 

 

 


अध्याय - 2

वेद, उपनिषद और वेदांग

 

भारतीय ज्ञान परम्परा विश्व की प्राचीनतम और सर्वसमृद्ध ज्ञान परम्पराओं में से एक है। इसका उद्देश्य केवल भौतिक या लौकिक जीवन को उन्नत करना नहीं है, बल्कि आत्मा, ब्रह्म और जगत के परम रहस्यों की खोज करना तथा मोक्ष की प्राप्ति करना भी है। इस महान परम्परा के तीन प्रमुख आधार स्तम्भ हैं— वेद, उपनिषद और वेदांग। ये न केवल धार्मिक और दार्शनिक चिंतन की आधारशिला हैं, अपितु भाषा-विज्ञान, गणित, खगोल, नीति, आयुर्वेद, संगीत और मनोविज्ञान जैसे विविध क्षेत्रों में भी मार्गदर्शक रहे हैं।

 

वेदों को ज्ञान का आदि स्रोत माना जाता है, उपनिषद उसका दार्शनिक सार हैं और वेदांग वेदों के सम्यक् अध्ययन व प्रयोग की विधियाँ सिखाते हैं। इन तीनों का समन्वय भारतीय विचारधारा की समग्र दृष्टि को प्रकट करता है।

 

वेद : प्राचीनतम ज्ञान स्त्रोत

वेद’ शब्द संस्कृत की विद्” धातु से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है— जानना। वेदों को अपौरुषेय माना गया है, अर्थात् ये किसी मानव की कृति नहीं, अपितु दिव्य प्रेरणा से प्रकट ज्ञान हैं। इन्हें श्रुति कहा जाता है क्योंकि इनका संप्रेषण श्रवण परम्परा से हुआ, पीढ़ी दर पीढ़ी गुरुओं ने इन्हें शिष्यों को मौखिक रूप से सौंपा।

 

डॉ० राधाकृष्णन ने कहा  है-

"वेद मानव मन से प्रकटित मानव-मन ऐसे निन्तान आदिकालीन प्रमाणिक ग्रन्थ है जिन्हें हम अपनी निधि समझते हैं।"

विल्सन के शब्दों में-

“वेदों से हमें उन सबके क विषय में जो प्राचीनता के बारे में विचार करने पर अत्यन्त रोचक प्रतीत होता है पर्याप्त जानकारी मिलती है।"

 

विल्सन की ये पंक्तियों राधा कृष्णन के मत का समर्थन करती है तथा इन कथनों से स्पष्ट होता है कि वेद न केवल धार्मिक ग्रंथ हैं, अपितु प्राचीन मानव सभ्यता, संस्कृति और चिंतन की अक्षय निधि हैं।

वेद चार हैं –
(1) ऋग्वेद
(2) यजुर्वेद
(3) सामवेद
(4) अथर्ववेद

ऋग्वेद में उन मंत्रों का संकलन है जो देवताओं की स्तुति हेतु रचे और गाये जाते थे। ये मंत्र भारत की पवित्र भूमि में जन्मी वैदिक संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। यहीं की ऋषि परम्परा ने दिव्य साक्षात्कार द्वारा इन मंत्रों की रचना की, जो मानवता को धर्म, प्रकृति और ब्रह्म के रहस्यों से अवगत कराते हैं। यजुर्वेद में यज्ञों की विधियाँ विस्तारपूर्वक वर्णित हैं, जो वैदिक जीवन के कर्मकाण्ड पक्ष को निर्देशित करती हैं। यह वेद यज्ञीय परम्पराओं और अनुष्ठानों का शास्त्र है। सामवेद में यज्ञीय मंत्रों को संगीतबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे मंत्रों की प्रभावशीलता और आध्यात्मिक शक्ति और भी गहराई से प्रकट होती है। सामवेद को भारतीय संगीत की जननी भी माना गया है क्योंकि यह मुख्यतः संगीत प्रधान वेद है। अथर्ववेद अपेक्षाकृत लोकजीवन से जुड़ा हुआ है, जिसमें तंत्र-मंत्र, चिकित्सा, औषधि तथा जीवन की व्यावहारिक समस्याओं का समाधान समाहित है। यद्यपि प्रथम तीन वेदों— ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद— में भाषा, शैली और विषयवस्तु की दृष्टि से साम्यता पाई जाती है, तथापि ऋग्वेद को सर्वाधिक मौलिक और प्रधान स्थान प्राप्त है। इसका प्रमुख कारण यह है कि एक तो इसमें विषयों की व्यापकता है, और दूसरा यह कि यह समस्त वैदिक साहित्य में सबसे प्राचीन है, जो भारतीय ज्ञान परम्परा की मूल जड़ के रूप में प्रतिष्ठित है।

प्रत्येक वेद चार प्रमुख उपविभागों में विभाजित है —

संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्।

'संहिता' वेदों का वह संग्रह है जिसमें मुख्यतः मंत्रों का समावेश होता है, जो प्रायः पद्य रूप में होते हैं। इन मंत्रों में देवताओं की स्तुति और प्रार्थना के लिए रचित अनेक श्लोक सम्मिलित होते हैं, जो वेदों की आत्मा कही जा सकती है।

'ब्राह्मण' ग्रन्थ प्रायः गद्य में लिखे गए हैं और इनमें यज्ञों की विधियों का विस्तृत वर्णन मिलता है। यहाँ केवल यज्ञ ही नहीं, बल्कि अन्य धार्मिक अनुष्ठानों और कर्मकाण्डों के नियमों तथा उनके संचालन के तरीके भी विस्तार से बताए गए हैं, जो वेदों के कर्मकाण्ड पक्ष को समझने में सहायक होते हैं।

'आरण्यक' उन ग्रन्थों को कहा जाता है जो वनों में निवास करने वाले ऋषियों के लिए उपासना और ध्यान के हेतु रचे गए हैं। ये ग्रन्थ आध्यात्मिक अन्वेषण और चिंतन के लिए मार्गदर्शक होते हैं और कर्मकाण्ड के पार जाकर गूढ़ तत्त्वज्ञान की ओर ले जाते हैं।

इन उपविभागों के बाद, वेदों में शुद्ध दार्शनिक विचारों का उत्कर्ष होता है, जिनका संकलन 'उपनिषद्' नामक ग्रंथों में किया गया है। उपनिषद् वेदों के अंतिम और सार्थक भाग होते हैं, जिनमें ब्रह्म और आत्मा के रहस्यों का दर्शन होता है। इन्हें 'ज्ञानकाण्ड' भी कहा जाता है क्योंकि ये सभी वेदों के दार्शनिक सार का संकलन हैं। इसी कारण उपनिषद् को 'वेदान्त' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'वेदों का अन्तिम हिस्सा' या 'वेदों का अंतिम लक्ष्य'। उपनिषद् वेदों के आध्यात्मिक और दार्शनिक गूढ़ता का प्रतीक हैं, जो मानव जीवन के उच्चतम सत्य की खोज में मार्गदर्शक होते हैं।

 

 

वेद के अध्ययन की आवश्यकता –

 

वेदों का अध्ययन अत्यंत लाभप्रद और आवश्यक है। भले ही हम आज के युग को वैज्ञानिक युग मानते हों, फिर भी वेदों का अध्ययन वांछनीय और प्रासंगिक बना हुआ है। वेद हमें न केवल लौकिक अर्थात् भौतिक जगत के विषयों का ज्ञान प्रदान करते हैं, बल्कि अलौकिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक गूढ़ताओं को भी समझने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। वेद ज्ञान का विशाल भंडार हैं, जिनसे हमें जीवन, ब्रह्माण्ड और मानव मन के अनेक रहस्यों का बोध होता है। अतः ज्ञान के समग्र विकास के लिए वेदों का अध्ययन अनिवार्य माना गया है।

इसके अतिरिक्त, वेदों को सम्यक् रूप से समझे बिना भारत के धार्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक इतिहास को समझना असंभव है। वेद भारतीय सभ्यता के मूल स्तम्भ हैं, जो न केवल प्राचीन विचारधाराओं का संकलन हैं, बल्कि दार्शनिक चिंतन और धार्मिक अनुष्ठानों की आधारशिला भी हैं। इसलिए दार्शनिक और धार्मिक इतिहास का सटीक अनुशीलन तभी संभव है जब हम वेदों की गहन जानकारी रखते हों। वेद हमें आदिम मानव के जीवन, उसकी मानसिकता और सामाजिक संरचना के बारे में भी महत्वपूर्ण ज्ञान देते हैं। आदिम मानव की मानसिक तथा आध्यात्मिक स्थिति की समझ के लिए भी वेदों का अध्ययन परमावश्यक है।

ऋग्वेद में हमें कवि हृदयों के भावुक और प्रगाढ़ उद्गार मिलते हैं, जो जगत और जीवन के रहस्यों को जानने और समझने का प्रयास करते हैं। वेदों में जीवन के सर्वोच्च लक्ष्यों—ज्ञान, सुख, मोक्ष और धर्म—के बारे में भी गहन चिंतन विद्यमान है। यही कारण है कि भारतीय ज्ञान परम्परा इतनी समृद्ध, विस्तृत और जीवंत रही है। यहाँ वेदों में संसार के रहस्यों की व्याख्या मानवीय तर्क, अनुभव और आध्यात्मिक अनुभूति से की गई है। इसीलिए वेदों को भारतीय ज्ञान परम्परा का आधार माना गया है और वेदों के अध्ययन को न केवल आवश्यक समझा जाता है, बल्कि इसे हमारे शिक्षा तंत्र में अनिवार्य रूप से सम्मिलित करना भी अत्यंत आवश्यक है।


उपनिषद - आत्मा और ब्रह्म का दार्शनिक संवाद

 

'उपनिषद' शब्द का शाब्दिक अर्थ है — गुरू के निकट बैठकर गूढ़ और रहस्यमय ज्ञान प्राप्त करना। यह ज्ञान साधारण नहीं, बल्कि अत्यंत गहन और दार्शनिक होता है, जिसे समझने के लिए गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक माना गया है। उपनिषद वेदों का अंतिम और सारगर्भित भाग हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से 'वेदान्त' कहा जाता है। वेदान्त का अर्थ है ‘वेद का अंत’ अर्थात वेदों का समापन और उनमें निहित अंतिम तत्व। उपनिषद वेदों की शिक्षाओं का सार हैं और समस्त वेदों के मूलभूत आधार भी।

उपनिषदों में गुरु और शिष्य के बीच गहन संवाद होता है, जहाँ शिष्य अपने प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करता है और ब्रह्म, आत्मा, ब्रह्माण्ड तथा जीवन के रहस्यों को समझता है। प्रसिद्ध विद्वान डायसन ने उपनिषद को ‘रहस्यमय उपदेश’ (Secret Interaction) कहा है। महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य ने उपनिषद को ‘ब्रह्मज्ञान’ की विद्या कहा है, जिससे मानव भ्रमों से मुक्त होकर सत्य की प्राप्ति करता है। यह ज्ञान मनुष्य के अज्ञान को पूर्णतः नष्ट कर, उसे आत्मज्ञान और परमानंद की ओर ले जाता है।

उपनिषदों की संख्या अनेक है, परंपरागत रूप से इन्हें 108 माना गया है। इनमें से मुख्य 10 उपनिषदों को प्रमुख माना जाता है — ईश, केन, प्रश्न, कठ, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, बृहदारण्यक, तथा तैत्तिरीय। उपनिषदें गद्य और पद्य दोनों रूपों में हैं, तथा इनकी भाषा अत्यंत काव्यमय, सूक्ष्म और प्रभावशाली होती है।

उपनिषद दार्शनिक और धार्मिक विचारों का समृद्ध भण्डार हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के ज्ञान छिपे हैं। एक उपनिषद में किसी विशेष विचार का विस्तार होता है, तो दूसरी उपनिषद में उसी विषय के विपरीत या विरोधी दृष्टिकोण की चर्चा मिलती है। इसी विविधता और बहुआयामी दृष्टिकोण के कारण श्लोकों और भाष्यों के माध्यम से उपनिषदों के विचारों को प्रमाणित और विस्तृत किया जाता है। उपनिषदों की यही व्यापकता और गहनता भारतीय दर्शन की अमूल्य धरोहर है।

 

उपनिषदों का महत्व -

उपनिषदों का भारतीय ज्ञान परंपरा के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भारतीय दर्शन के विभिन्न सम्प्रदायों की जड़ें उपनिषदों में ही निहित हैं। उपनिषदों ने न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना को आकार दिया, बल्कि भारत की बौद्धिक क्रांति के प्रत्येक चरण में मार्गदर्शन प्रदान किया है।

विख्यात पाश्चात्य विद्वान ब्लूमफील्ड ने कहा है—

नास्तिक बौद्ध मत को छोड़कर हिन्दू चिंतन की कोई भी महत्वपूर्ण धारा ऐसी नहीं है जिसका मूल उपनिषदों में न हो।”

यह कथन उपनिषदों की व्यापकता और भारतीय चिंतन पर उनके प्रभाव को दर्शाता है। उदाहरणस्वरूप, बौद्ध दर्शन का 'अनात्मवाद' कठोपनिषद के उस वाक्य में स्पष्ट झलकता है, जिसमें यह प्रश्न उठाया गया है—मनुष्य के मरने के बाद वह रहता है या नहीं?” इसी प्रकार, बुद्ध के 'दुःखवाद' का आधार उपनिषद के 'सर्वं दुःखम्' वाक्य में खोजा जा सकता है, और 'क्षणिकवाद' की झलक 'सर्वं क्षणिकं क्षणिकम्' में मिलती है। उपनिषदों में ही आदि शंकराचार्य के ‘ब्रह्म और आत्मा की अद्वैत सत्ता’ का आधारशिला भी स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है।

इतिहास साक्षी है कि जब-जब भारत में कोई महान बौद्धिक या सामाजिक क्रांति आई है, तब-तब इस भूमि के दार्शनिकों ने उपनिषदों से प्रेरणा प्राप्त की है। संकट के समयों में उपनिषद केवल विचार नहीं, बल्कि दिशा बनकर मानवता का मार्गदर्शन करते आए हैं। जब धर्म और दर्शन के मध्य द्वंद्व उपस्थित हुआ है, या विज्ञान और आध्यात्मिकता में विरोधाभास प्रतीत हुआ है, तब उपनिषदों की गूढ़ दृष्टि ने इन विरोधों को समन्वय में रूपांतरित किया है। उपनिषदों ने न केवल विचारशील व्यक्ति का मार्ग प्रशस्त किया है, बल्कि समूची संस्कृति को संतुलन, आत्मबोध और आंतरिक शक्ति का बोध कराया है।

 

प्रो॰ रानाडे का यह कथन अत्यंत प्रासंगिक है—

उपनिषद हमें ऐसी दृष्टि प्रदान करते हैं जो मानव की दार्शनिक, वैज्ञानिक और धार्मिक आवश्यकताओं की एक साथ पूर्ति कर सकती है।”

 

उपनिषदों से केवल भारतीय मनीषियों ने ही नहीं, अपितु पाश्चात्य चिंतकों ने भी अनुपम प्रेरणा प्राप्त की है। इन गूढ़ ग्रंथों की आध्यात्मिक ऊँचाई और दार्शनिक गहराई को विश्वभर के विद्वानों ने सराहा है। प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक आर्थर शोपेनहावर ने उपनिषदों की महत्ता को उद्घाटित करते हुए कहा था—

“In the whole world there is no study so beneficial and elevating as that of the Upanishads. It has been the solace of my life; it will be the solace of my death.”

अर्थात्, संपूर्ण विश्व में उपनिषदों के अध्ययन से अधिक लाभप्रद और उन्नयनकारी अध्ययन कोई नहीं है; यह मेरे जीवन का सहारा रहा है और मेरी मृत्यु का भी सहारा रहेगा।“

 

महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानन्द, श्री अरविन्द और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे भारत के मूर्धन्य मनीषियों की वैचारिक साधना का मूल स्रोत भी उपनिषद ही रहे हैं। इन ग्रंथों के 'तत्त्वमसि', 'अहं ब्रह्मास्मि', 'प्रज्ञानं ब्रह्म' और 'अयमात्मा ब्रह्म' जैसे महावाक्य आत्मा और ब्रह्म की अद्वैतता का उद्घोष करते हैं — जो आत्म साक्षात्कार की सर्वोच्च यात्रा में पथप्रदर्शक बनते हैं।

उपनिषदों की विशेषता केवल उनके ज्ञान में नहीं, बल्कि उस संवाद परंपरा में भी है, जो गुरु और शिष्य के मध्य चिंतन, संशय और समाधान के माध्यम से विकसित होती है। यह परंपरा आज के शैक्षिक परिप्रेक्ष्य में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जहाँ शिक्षा केवल जानकारी नहीं, आत्मबोध की ओर उन्मुख साधना होनी चाहिए।

इनकी शिक्षाएँ किसी जाति, सम्प्रदाय, वर्ण या वर्ग की सीमा में आबद्ध नहीं हैं, बल्कि यह सम्पूर्ण मानवता के लिए हैं — क्योंकि उपनिषद सार्वभौमिक और शाश्वत सत्य पर आधारित हैं। इनके विचार युगातीत हैं, जो आज भी वैज्ञानिक विवेक और दार्शनिक चिंतन के आलोक में उतने ही प्रासंगिक हैं जितने सहस्रों वर्ष पूर्व थे।

निस्संदेह, उपनिषद भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा हैं। वे मनुष्य को बाहर नहीं, भीतर की यात्रा के लिए आमंत्रित करते हैं — एक ऐसी यात्रा जो आत्मा के रहस्यों को जानने, ब्रह्म की अनुभूति करने और जीवन के परम उद्देश्य से साक्षात्कार कराने वाली है। वे न केवल जिज्ञासा को उत्तर देते हैं, अपितु उसे तप में रूपांतरित कर आत्मप्रकाश की दिशा में ले जाते हैं।

 

वेदांग: वेदों का व्यावहारिक आधार

 

भारतीय ज्ञान परंपरा में वेदांगों का स्थान अत्यंत विशिष्ट और केंद्रीय है। वेद, जो ब्रह्मांडीय ज्ञान और चिरंतन सत्य के परम स्रोत हैं, उनकी गूढ़ वाणी को यथार्थ रूप में समझने, आत्मसात करने और शुद्ध रूप से व्यवहार में लाने हेतु भारतीय ऋषियों  ने कालानुक्रम में छह वेदांगों का सुव्यवस्थित संवर्धन और परिष्करण किया। वेदांग वेदों की चेतना को व्यवहार में प्रतिष्ठित करने वाले तर्कसंगत उपकरण हैं—वे न केवल वैदिक ज्ञान की रक्षा करते हैं, बल्कि उसे जीवंत, प्रासंगिक और वैज्ञानिक रूप में प्रस्तुत करने का माध्यम भी हैं।

वेदों को सही रूप में समझने के लिए छह वेदांगों का विवरण प्राप्त होता है—

1.  शिक्षायह स्वर और उच्चारण का शास्त्र है, जो वेद-मंत्रों की ध्वनि-शुद्धता और लयात्मकता को सुनिश्चित करता है।

2.  व्याकरणयह भाषा-विज्ञान का आधार है, जो वैदिक संस्कृत के शब्द-रूप, वाक्य-विन्यास और संप्रेषणीयता को स्पष्ट करता है।

3.  छन्दयह मंत्रों के छंदबद्ध विन्यास, मात्रा, गति और लय का विश्लेषण करता है, जिससे वैदिक वाणी संगीतात्मक रूप में संरक्षित रहती है।

4.  निरुक्तयह शब्दों की व्युत्पत्ति, अर्थ, भाव और प्रसंग का विवेचन करता है; यह वेदों के अर्थबोध की कुंजी है।

5.  ज्योतिषयह कालगणना, खगोलीय घटनाओं और ऋतुचक्र पर आधारित ज्ञान है, जो यज्ञ और अनुष्ठानों के उपयुक्त समय निर्धारण में सहायक होता है।

6.  कल्पयह धार्मिक अनुष्ठानों, संस्कारों और कर्मकाण्डों की विधिपूर्वक संरचना है, जो वैदिक जीवन-पद्धति को व्यवस्थित करती है।

इन वेदांगों के अभाव में न तो वेदों का अध्ययन पूर्ण होता है, न ही उनकी व्याख्या प्रमाणिक। वेदांग, वेदों की व्याख्या और अनुष्ठानिक प्रयोग के सेतु हैं — जहाँ वेद ब्रह्म की वाणी हैं, वहीं वेदांग उस वाणी के संरक्षक, व्याख्याता और व्यवहार में प्राण फूंकने वाले हैं।

वेदांगों की भारतीय ज्ञान परम्परा में भूमिका-

वेदांगों के बिना वैदिक मंत्रों की रक्षा की कल्पना भी नहीं की जा सकती। वे शिक्षा और परंपरा की वह सुदृढ़ रीढ़ हैं, जिनके माध्यम से श्रुति परंपरा सहस्राब्दियों तक अपनी प्रमाणिकता बनाए रखने में सफल रही है। कल्पसूत्रों और धर्मसूत्रों में गृहस्थाश्रम, संस्कार, आचार, नियम, विवाह, श्राद्ध आदि जीवनोपयोगी विधियों के विस्तृत दिशानिर्देश मिलते हैं, जो आज भी भारत के अनेक परिवारों और सम्प्रदायों में परंपरागत रूप से प्रचलित हैं।

पाणिनि का व्याकरण-शास्त्र आज भी भाषा-विज्ञान की सर्वोच्च उपलब्धियों में गिना जाता है, जिसे विश्वभर के विद्वान सम्मानपूर्वक उद्धृत करते हैं। निरुक्त के माध्यम से शब्दों की व्युत्पत्ति और अर्थ की गहन व्याख्या की परंपरा स्थापित हुई, जिसने भारतीय भाषिक और दार्शनिक चिंतन को अद्वितीय गहराई प्रदान की। वेदांग ज्योतिष में गणना, खगोल, गति, काल, ऋतुचक्र आदि विषयों का समावेश होता है। यह भारतीय खगोलशास्त्र का प्रारंभिक, परंतु अत्यंत वैज्ञानिक रूप है, जो समय की गणना और ब्रह्मांडीय घटनाओं के अध्ययन का आधार प्रदान करता है।

वेदांग, वेदों के अंग होने के नाते, भारतीय ज्ञान परम्परा की वैज्ञानिकता, व्यवहारिकता और शुद्धता के रक्षक हैं। वे न केवल धार्मिक कर्मकाण्ड की विधियों को, संरचित करते हैं बल्कि भाषा, तर्क, छन्द और खगोल जैसे ज्ञान, विज्ञान के क्षेत्र में मूल आधार प्रदान करते हैं। इनकी विद्वतापूर्ण रचना और प्रयोग दर्शाते है कि भारतीय ज्ञान परम्परा में ज्ञान केवल भक्ति या कर्मकांड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक समग्र संरचित और तर्कपूर्ण प्रणाली के रूप में विकसित हुआ।

अतः वेद, उपनिषद और वेदांग मिलकर भारतीय ज्ञान परम्परा का सम्पूर्ण ढांचा तैयार करते है। जहां वेद ब्रह्मांडीय ज्ञान का मूल स्तोत्र है, वहीं उपनिषद उस ज्ञान का तात्विक दार्शनिक विवेचन तथा वेदांग उस ज्ञान के व्यवहार और शुद्ध प्रयोग की विधियों है। यह सभी भारतीय ज्ञान परम्परा के केवल धार्मिक ग्रन्थ नहीं बल्कि सम्पूर्ण जीवन व्यवस्था की नींव है। हम इन्हें भारतीय शिक्षा नीति में पुनः स्थापना करके तथा संस्कृत, तर्कशास्त्र, योग दर्शन जैसे विषयों को शामिल करके हमारी शिक्षा नीति को सर्वश्रेष्ठ बना सकते हैं। जिससे भारतीय जीवन शैली में संतुलन, कर्तव्य, सेवा, त्याग की भावना जागृत हो तथा पर्यावरण सामाजिक समरसता और धर्म का नैतिक आधार विकसित हो और हम पुनः विश्वगुरु के पथ पर आगे बढ़े।

वेद, उपनिषद और वेदांग — ये तीनों न केवल भारत की धार्मिक चेतना को पोषित करते हैं, बल्कि भारतीय ज्ञान, विज्ञान, भाषा और दर्शन की समग्र संरचना का निर्माण भी करते हैं।


अध्याय – 4
भारतीय परंपरा में गणित

 

गणित शास्त्र का अर्थ

भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रारंभ से ही गणित को समस्त शास्त्रों में शीर्षस्थ कहा जाता है। आचार्यों ने तो यहां तक कहा है की प्रकृति में गणित के बिना कुछ संभव नहीं है। गणित शब्द “गण्”  धातु में “क्त” प्रत्यय लगाकर बना है। “गण्”  धातु का अर्थ है - गिनना और इस प्रकार गणित का अर्थ जिसमें गणना की जाती है। इसी अर्थ में मित् नापा हुआ और संख्या गिनती किया हुआ। शब्दों का भी प्रयोग कभी कभी होता रहा है, किंतु शास्त्र का नाम प्रायः गणित ही रहा है।

 

कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार —

प्राचीन काल में गणित के पर्याय थे – गणना, संख्या, संख्या शास्त्र

 

गणित शास्त्र का उद्भव- 

भारतीय ज्ञान परंपरा में गणित प्राचीनतम शास्त्रों में से एक है। प्राचीनतम उपलब्ध वैदिक साहित्य में गणित के ज्ञान का पर्याप्त परिचय मिलता है। गणित शास्त्र सार्वभौम है। शिष्ट समाज से लेकर जंगलों में रहने वाली सभी जातियां अपने ढंग से कामकाज चलाने के लिए हिसाब लगती है। संसार के प्रायः सभी देशों में गणित अंक तथा गिनती से हुआ। यही गिनती कुछ काल पश्चात अंक गणित में परिणत हो गई तथा दीर्घकाल बीतने पर गणित रूपी वृक्ष की अनेक शाखाएं बीजगणित, त्रिकोणमिति एवं ज्यामिति अस्तित्व में आई।

 

भारतीय परंपरा में गणित, नाट्यशास्त्र का स्रोत यज्ञ रहा है। अतः वेदांग ज्योतिष में ऋषि लगध ने लिखा है – 

यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।

तद्वद् वेदांगशास्त्राणां गणितं मूर्ध्नि संस्थितम्॥

 

जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि का स्थान सबसे ऊपर है, वैसे ही सभी वेदांग और शास्त्रों मे गणित का स्थान सबसे ऊपर है।

प्राचीन काल में यज्ञ के लिए वेदियां बनती थी। यज्ञ काल की सिद्धि के लिए उन्हें उचित गणना की अथवा ज्योतिष संबंध गणना गति, स्थिति आदि की आवश्यकता पड़ती थी। परम आदिकाल से ही तारों के अवलोकन से अनुमान लगाए जाते थे। मनुष्य मात्र के आविर्भाव से ही ज्योतिष पिंडों (celestial bodies) का अवलोकन प्रारंभ हो गया था। लेकिन खगोल गणित (Astronomy) का विकास तभी हो पाया होगा, जब मनुष्य जाति परिकलन (Calculation) कैलकुलेशन में काफी आगे बढ़ चुकी होगी इसलिए ज्यामिति (Geometry) और खगोल गणित का अध्ययन आवश्यक था 

 

 

 

1. वैदिक काल - (3000 ईसवी पूर्व से 1000 ईसवी पूर्व तक)

वैदिक साहित्य में ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन है यद्यपि इसमें गणित शब्द अपने मूल रूप में नहीं आया, किंतु गणक, गण, गण्या आदि शब्द ऋग्वेद में मिलते हैं। इस काल की विश्व की सबसे बड़ी देन संख्याओं का आविष्कार तथा दाशमिक प्रणाली (Decimal System) है। एक से लेकर सहस्त्र (1000) तक की संख्याओं के नाम तथा अरब (अर्बुद) संख्या का नाम अब तक चला आ रहा है। बाद की संख्याओं का नाम परार्ध (1012) तक है। बौद्ध साहित्य में दश सहस्त्र (10000), लक्ष (100000), कोटी (एक करोड़), ख़र्ब, नील, पदम, समुंद्र शब्द प्रचलित हो गए। यजुर्वेद में एक मंत्र में असंख्य सहस्त्रों का भी उल्लेख आता है। वे किसी वस्तु का भाग करने जानते थे क्योंकि अर्ध (½) , पाद (¼) , शफ () तथा कुष्ठ  आदि शब्द वेदों में आए हैं।

 

यजुर्वेद के तैत्तिरीय संहिता में युग्म (Even) तथा अयुग्म (Odd) संख्याओं का उल्लेख तथा 100 तक सारणियां भी उपलब्ध है। सामान्य अंक गणितीय संक्रियाएं (Arithmetical Operation) जैसे जोड़, घटाना, गुणा, भाग बहुत परिष्कृत रूप से वैदिक साहित्य में मिल जाते हैं।

 

तैत्तिरीय संहिता में 10 लोक तक की संख्याओं के नाम दशमलव पद्धति से दिए गए हैं। अतः तैत्तिरीय संहिता दाशमिक प्रणाली (Decimal System) के ज्ञान का प्रमाण तथा बड़ी संख्याओं के लिए नाम गढ़ने की वैज्ञानिक जरूरत का भी प्रमाण है।

 

2. शुल्व काल – (1000 ईसवी पूर्व से 500 ईसवी पूर्व तक)

 

यज्ञ की वेदियों की उपयुक्त रचना के लिए रेखा गणितीय प्रक्रियाओं का ज्ञान अपेक्षित था - 

1.  सरल रेखा खंड पर वर्ग बनाना।

2.  वर्ग के चारों ओर वृत्त खींचना और वृत्त के अंदर वर्ग खींचना, वर्ग के बराबर वृत्त तथा वृत्त  के बराबर वर्ग खींचना।

3.  वर्ग के विकर्ण का वर्ग की उसकी भुजा के वर्ग का दुगना होता है।

4.  दी गई भुजाओ से आयत, समलंब चतुर्भुज बनाना 

शुल्ब सूत्रों में कई प्रमेय (Theorem) दिए गए हैं, जिसके अनुसार यज्ञ वेदियों की रचना होती थी।

शताब्दियों से प्रचलित इन नियमों को बताने के लिए ऋषियों ने शुल्ब सूत्रों की रचना की। शुल्व उस रज्जू (Rope) को कहते थे। जिससे वेदी बनाई जाती थी। उस समय वह जो कार्य रज्जू से करते थे वह आज पट्टा (Scale) तथा परकार (Compass) से होता है।

इस ज्यामितीय ज्ञान के अतिरिक्त जोड़ (Addition),  घटाव (Subtraction), अभ्यास और भाग (Division) आदि शब्दों के व्यवहार से पता चलता है कि शुल्व काल में गणित की मूलभूत प्रक्रियाओं के नाम चरम उत्कर्ष पर थे।

 

पाइथागोरस प्रमेय का ज्ञान —

 

बोधायन के शुल्व सूत्र (12) में इसका उल्लेख सर्वप्रथम मिलता है। 

 

दीर्घ चतुरश्रस्याक्ष्णयारज्जुः पार्श्वमानी तिर्यङ्गानी च यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति।।

 

"एक आयत में, विकर्ण (पार्श्वमानी) पर बनाई गई रस्सी का वर्ग, उस आयत की भुजाओं (पार्श्वमानी और तिर्यक मानी) पर बनाए गए वर्गों के योग के बराबर होता है।

 

किसी आयत के विकर्ण द्वारा व्युत्पन्न क्षेत्रफल उसकी लम्बाई एवं चौड़ाई द्वारा पृथक-पृथक व्युत्पन्न क्षेत्र फलों के योग के बराबर होता है।

पाइथागोरस (540 ई०पूर्व) से 460 ई०पूर्व बोधायन (1000 ई०पूर्व)  उपयुक्त सिद्धांत की पूर्णता प्रतिपादन कर चुके थे। 

π का मान — 

वर्ग के बराबर वृत्त खींचने के प्रसंग में पाई का मान अंतर्निहित हो जाता है। मानव शुल्वसूत्र में कहा जाता है कि दो हाथ का वर्ग, एक हाथ तीन अंगुल अर्ध व्यास पर बने वृत्त के बराबर होता है। जिसको यदि गणितीय भाषा में लिखें तो यह समीकरण बनेगा –

22 = π

अर्थात्  π = 4×= 4×= 3.16049

 

·        करणी (Surd) का ज्ञान भी शुल्व सूत्र में उल्लेखित है।

 

3. वेदांग काल (1000 ई०पूर्व - 500 ई० पूर्व तक)

 

गणित शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वेदांग ज्योतिष में मिलता है।

गणितं मूध्निर् संस्थितम्,”

जिसके कर्ता लगध  माने जाते हैं। उनके अनुसार वेदों की प्रवृत्ति यज्ञों के निमित्त हुई तथा यज्ञ यथा काल किए जाते हैं। उस समय ज्योतिषी योग, वियोग, गुणा, भाग करना जानते थे।  

वेदांग ज्योतिष के अध्ययन से ज्ञात होता है कि उस समय (800 ई.पूर्व) ज्योतिष योग, वियोग, गुणा, भाग करना जानते थे। उनको भिन्‍नों की भी उक्‍त प्रक्रियाएँ आती थीं यथा-

तिथिमेकादशाभ्‍यस्‍तां पर्वभांशसमन्विताम्।

विभज्‍य भसमूहेन तिथिनक्षत्रमादिशेत्।।

संख्या से भाग दें। इस प्रकार तिथि का प्रयोग है। इस प्रकार शुल्वसूत्रों में आई गणितकी आधारभूत प्रक्रियाएं तथा भिन्‍नों की प्रक्रियाएँ ज्‍यामितीय प्रयोग के लिए काम आती थीं, फलत: अकगणितीय मूलभूत प्रक्रियाओं का ज्ञान  उन्‍नति पर था।

 

4. शैशव काल ( 500 ई०पूर्व - 500ई)

 

पंडित बलदेव उपाध्याय ने इस युग को हिंदू गणित शास्त्र के शैशवावस्था का अंधकार युग माना क्योंकि इस युग में गणित की पुस्तकें कलकवलित हो चुकी थी। यदि जैन मुनि इन धार्मिक ग्रंथों को संजोकर न रखते तो गणित का एतत्‍कालीन इतिहास विलुप्त हो गया होता। स्थानांगसूत्र, भगवतीसूत्र, एवं अनयुोगद्वार आदि गणितीय संदर्भों से ओतप्रोत ग्रंथ हैं। इस समय के प्रमुख अविष्कार तथा महत्त्‍वपूर्ण कृतियाँ इस प्रकार है-

दाशमिक प्रणाली तथा शुन्य का आविष्कार – 

ऋग्वैदिक काल से लेकर पिंगल छंद शास्त्र से शून्य के सांकेतिक चिन्ह मिलते हैं। छंद के प्रस्तार के संबंध में लिखा है रुपे शून्यम् अर्थात शून्य स्थान में दो बार आवृत्ति कीजिए। संसार भर में बुद्धि और सभ्यता के विकास में सहायक सर्वाधिक महत्वपूर्ण भारतीय गणितीय आविष्कार शून्य का ही है।

शून्य  के आविष्कार के संबंध में अमेरिका एक प्रमुख गणितज्ञ Professor George Bruce Halsted के विचार उल्लेखनीय हैं – 

"The giving to airy nothing, not merely a local habitation and a name, a picture, a symbol, but helpful power, is the characteristic of the Hindu race whence it sprang. It is like coining Nirvana into dynamos. No single mathematical creation has been more potent for the general on-go of intelligence and power.”

अंकगणित का विकास – 

 

वक्षाली गणित पेशावर जिले के युसूफजइ तहसील में वक्षले नाम का एक ग्राम है जो काबुल से 150 मील  तथा श्रीनगर से 160 मील दूर दसवीं शताब्दी के अंत में एक किसान के हल जोतते समय पत्थर की शिला के नीचे दबे हुए गणित की प्राचीन पुस्तक मिली। जिसे वक्षाली पांडुलिपि  लिपि कहा जाता है।

इससे तीसरी शताब्दी ईस्वी में अंकगणित के विकास के प्रमाण मिले। वक्षाली गणित को देखने से पता चलता है कि उस समय से भी पूर्व गणित पर पुस्तकें लिखी जाती रही होंगी , जो की कालक्रम में नष्ट हो गई। यह अनुमान निश्चित है कि ₹300 ई० पूर्व ही अंक गणित का विकास हो चुका था।

 

त्रिकोणमिति का विकास — 

 

छठी शताब्दी में पंच सिद्धांतिका में - पितामह, वशिष्ठ रोमक, पौलिश व सूर्य सिद्धांत का वर्णन है। इसमें से सूर्य सिद्धांत का गणित के क्षेत्र में योगदान कहा जा सकता है।  इसके रचयिता स्वयं सूर्य है, कहा जाता है कि स्वयं भगवान सूर्य ने मय नाम के असुर से प्रसन्न होकर उसे ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान दिया। जो प्रतीकात्मक प्रतीत होता है।

सूर्य सिद्धांत में ज्या (sin)  कोटिज्या (cosin) उत्क्रमज्या  (versin) तीन त्रिकोणमिति फलनों का उल्लेख है।

 


 

शून्य का आविष्कार — 

 

अंकगणित का आधार अंक प्रणाली है, जिसमें शून्य का महत्वपूर्ण स्थान है, इसका प्रमुख श्रेय संस्कृत व्याकरण आचार्य पाणिनी 500 ई० पूर्व तथा पिंगल  200ई० पूर्व को दिया जाता है। शून्य का आविष्कार वैदिक ऋषि मृत्समद ने किया था, इस प्रकार का भी उल्लेख मिलता है।

शून्य के लिए चिन्ह निश्चित करने का सर्वप्रथम साक्ष्य वक्षाली पांडुलिपि (300 - 400 ई०पूर्व) में पाया जाता है। प्राचीन भारत के अंकीय पद्धति में शून्य तथा इसके चिन्ह का योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

शून्य (०) का आविष्कार करने वाला भारत ही था। उस देश में जब वैदिक गणित का प्रसार हुआ तो उस देश ने शून्य को हिंदसा नाम दिया। गणितज्ञ भास्कराचार्य ने शून्य के संबंध में लिखा है —

शून्य को किसी राशि से जोड़ने अथवा शून्य में किसी राशि को  घटाने से राशि में कोई परिवर्तन नहीं होता है। भास्कराचार्य ने यह भी स्वीकार किया कि किसी संख्या में से शून्य का भाग देने पर अनंत प्राप्त होता है। भास्कराचार्य ने इसे खहर नाम दिया।

 

गणित की अनेक विद्याओं सहित शून्य एवं अनंत की अवधारणाओं पर व्यापक शोध एवं उनके अनुप्रयोग वराहमिहिर द्वारा स्थापित कापित्थका गुरुकुल उज्जैन में है।

 

ब्रह्मगुप्त का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने अपनी रचना ब्रह्मस्फुट सिद्धांत में शून्य के साथ गणनात्मक नियम दिए।

उदाहरण: 

  • अ + ० = अ
  • अ – ० = अ
  • अ × ० = ०
  • लेकिन अ ÷ ० = अव्यक्त (Undefined)

 

शून्य के लिए (०) गोल बिंदु या वृताकार चिन्ह का प्रयोग भारत में पहले हुआ। पश्चिमी दुनिया में इसे हिंदू अरेबिक न्यूमैराल सिस्टम (Hindu Arabic Numeral System) के रूप में जाना गया।

शून्य की खोज भारत की एक अद्वितीय देन हैं, जिसने मानव सभ्यता के बौद्धिक इतिहास को नई दिशा दी। यह केवल गणितीय प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, तर्कशास्त्र और विज्ञान के समन्वय का प्रतीक है। भारतीय ज्ञान परंपरा में शून्य, शून्यता की अवधारणा से जुड़ते हुए ज्ञान के शुद्धतम स्वरूप की ओर संकेत करता है।

 

स्थानीय मान (Place Value System) -

 

किसी भी संख्या को शून्य सहित 10 अंकों में व्यक्त करना और प्रत्येक अंकों का एक निरपेक्ष मान और एक स्थानीय मान देने के कारण यह अंक पद्धति वैज्ञानिक अंक पद्धति हुई। स्थानीय मान आधुनिक संख्या प्रणाली की विशेषता है।

आर्यभट्टीय (499 ई० के आसपास) में आर्यभट्ट ने अक्षरों के माध्यम से अंकों को दर्शाने की प्रणाली का प्रयोग किया जो स्थानीय मान की ओर संकेत करती है।

 

भास्कराचार्य और ब्रह्मगुप्त जैसे गणितज्ञ के कार्यो में स्पष्ट रूप से दशमलव और स्थानीय मान प्रणाली का प्रयोग मिलता है। स्थानिक मान का अर्थ है किसी अंक का मान उसके स्थान (position) पर निर्भर करता है।

 

उदाहरण - संख्या 245 में

5 का स्थान – इकाई - मान = 5

4 का स्थान - दहाई - मान 10

2 का स्थान – सैकडा - मान - 200

इस प्रकार कुल मान – 200 + 40 + 5 = 245

 

हर स्थान दाई ओर से बायें जाने पर 10 गुणा हो जाता है। इकाई (1), दहाई (10), सैकड़ा (100), हजार (1000).

इस प्रणाली ने संख्याओं को छोटे रूप में व्यक्त करना सम्भव किया। जबकि रोमन प्रणाली में इसे व्यक्त करना कठिन होता है। अरब विद्वानों ने भारतीय गणित को अपनाया और यूरोप तक फैलाया । वर्तमान में प्रयुक्त अंको और गणना पद्धति की नींव भारतीय प्रणाली में निहित है।

 

भारतीय ज्ञान परम्परा में स्थानीय मान प्रणाली -

 

(Place value system) का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। यह प्रणाली विश्व गणित को भारतीय उपहारों में से एक मानी जाती है। जिसने संख्याओं की गणना, लेखन और समझने की प्रक्रिया को सरल, तार्किक और प्रभावी बना दिया। यह प्रणाली आज सम्पूर्ण विश्व में प्रयोग हो रही है और भारतीय ज्ञान परम्परा को अमूल्य देन मानी जाती है।

दशमलव पद्धति – 

 

वर्तमान में प्रचलित संख्या पद्धति का आधार दस है। अतः दाशमिक प्रणाली या दशमलव प्रणाली कहते हैं। इसमें 0 से 9 तक कुल 10 अंक होते हैं, जिससे हम बड़ी से बड़ी संख्या लिख सकते हैं।

शून्य में अंको को उनके स्थान के अनुसार अलग-अलग मान देने की क्षमता प्रदान की, यही दशमलव प्रणाली की आत्मा है।

आर्यभट्ट (476-550 ई०) ने आर्यभटीय में बड़ी संख्याओं  को अक्षरों द्वारा प्रकट किया और स्थानिक मान की झलक दी। ब्रह्मगुप्त में' ब्रह्मस्फुट सिद्धांत में शून्य, ऋणात्मक संख्याओं और दशमलव प्रणाली का विस्तृत उपयोग किया है। भास्कराचार्य ने लीलावती और बीजगणित में दशमलव संख्याओं, भिन्नों और अंशों के साथ गणना की विधियों प्रस्तुत की।

दशमलव प्रणाली बड़ी संख्याओं को कम अंको में लिखने में सहायता करती है। दशमलव बिन्दु द्वारा अंशात्मक संख्याओं को सूक्ष्मता से प्रकट किया जा सकता है। जोड़ ,घटाव, गुणा, भाग जैसी गणनाएं सरल हो जाती हैं

 

उदाहरण - 

1÷10 = 0.1

6x0.1 = 0.6

1÷100 = 10-2 = 0.01

7×.01 = 0.07

संख्या 345.67 = 3X100+4×10+5×1+6x(1÷10)+7×(1÷100) को लिखा जा सकता है।

भारतीय ज्ञान परम्परा में दशमलव पद्धति की खोज महत्वपूर्ण स्थान स्थान रखता है। भारतीय गणितज्ञों ने दशमलव पद्धति और शून्य की खोज करके एक ऐसी प्रणाली दी जो आज सम्पूर्ण विश्व की वैज्ञानिक, आर्थिक और शैक्षाणिक संरचना की नीव बन चुकी है। यह भारतीय ज्ञान परम्परा की वैज्ञानिक दृष्टि, गहन विचार क्षमता और तार्किकता का जीवंत प्रमाण है।

 

पाई की खोज -

 

आर्यभट्ट पहले गणितज्ञ थे जिन्होंने परिधि और व्यास  के अनुपात अर्थात पाई (π) का लगभग परिमित मान  निकला था।

चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।

अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥

अर्थात सौ में चार जोड़कर 8 से गुणा करें और उसमें 62000 जोड़े। यह  योगफल 20,000 व्यास के वृत्त की परिधि का लगभग माप होगा।

 

 

पाई (π) =  =  = 3.1416

 

इस प्रकार इनके अनुसार पाई = 3.1416, जो दशमलव के चार स्थानों तक आज भी सही है।

शुल्ब सूत्र (800- 500 ई.पूर्व)  में यज्ञ वेदियों के निर्माण के लिए वृत्त और वर्ग की तुलना की गई है। आपस्तंब शुल्ब सूत्र में वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात 3 माना गया।

"परिधिः त्रिगुण एव व्यासस्य भवति

व्यास का त्रिगुण परिधि होता है।

यह अनुमान प्रारम्भिक रूप था, परन्तु आगे चलकर आर्यभट्ट ने पाई का सटीक मान दिया। भास्कराचार्य ने भी पाई के उपयोग और वृत्त संबंधित गणनाओं लीलावती में स्पष्ट किया है। इन्होने पाई के अपरिमेय संख्या के रूप में स्वीकार किया। जिसे पूर्णत व्यक्त नहीं नहीं किया जा सकता है।

माधव (केरल) ने पाई  का मान श्रृंखला (Series) द्वारा निकाला, जो बाद में Leibniz Series से प्रसिद्ध हुई।

पाई (π) = 4

पाई (π) की गणना में भारतीय मनीषियों का योगदान अभूतपूर्व रहा है। आर्यभट की गणितीय दृष्टि, माधव की श्रृंखला आधारित विधियां और भास्कराचार्य की सूक्ष्म विवेचनात्मक शैली, इस बात का प्रमाण है कि भारतीय गणित केवल सैद्धान्तिक नहीं  बल्कि उच्च स्तर का अनुसंधान और प्रयोगात्मक गणित है।

 

बीजगणित - 

 

बीजगणित (algebra) जिसे संस्कृत में बीजगणितम् कहा गया, भारतीय गणित परंपरा का अद्वितीय और गहन योगदान है। आधुनिक गणित में बीजगणित की जो विधियां और सिद्धांत माने जाते हैं, उनके मूल स्वरूप का विकास भारत में पांचवी से 12वीं शताब्दी के बीच हो चुका था।

संस्कृत में बीज का अर्थ (Root या Beed), अर्थात मूल तत्व या प्रारंभिक संख्या तथा गणित का अर्थ गणना (Calculation) है। बीजगणित का अभिप्राय ऐसी गणना से है, जिसमें प्रतीकोंचिन्हों और अज्ञात राशियों (Unknown Quantities) के माध्यम से समीकरणों को हल किया जाता है।

बीजगणित के लिए (Algebra) शब्द की उत्पत्ति अरबी शब्द "अल-जबर" (al-jabr) से हुई है। यह शब्द प्रसिद्ध मुस्लिम गणितज्ञ मोहम्मद इब्न मूसा अल-ख़वारिज़्मी (Muhammad ibn Musa al-Khwarizmi) की पुस्तक से लिया गया है, जिसका नाम था:

“Al-Kitāb al-Mukhtaar fī isāb al-Jabr wal-Muqābala”

(The Compendious Book on Calculation by Completion and Balancing).

यह पुस्तक लगभग 820 ईस्वी में लिखी गई थी और इसमें समीकरणों को हल करने के तरीके (विशेष रूप से द्विघात समीकरण) वर्णित थे। इसमें "अल-जबर" का अर्थ है, "पूर्ण करना" या "पुनःस्थापन" (जैसे ऋणात्मक संख्याओं को हटाकर धनात्मक बनाना), और "मुक़ाबला" का अर्थ है, “संतुलन”, "Al-jabr" शब्द से ही आगे चलकर "Algebra" शब्द अंग्रेज़ी व अन्य भाषाओं में प्रचलित हुआ।  किंतु आर्यभट्ट और ब्रह्म गुप्त जैसे भारतीय गणितज्ञों ने इसे बहुत पहले ही इस क्षेत्र में बहुत सा काम किया था। बाद में भारतीय गणितज्ञ जैसे कि महावीर, श्रीधर ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिऐं।


भास्कराचार्य ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक बीजगणितम् में बीजगणित को एक स्वतंत्र शाखा के रूप में प्रस्तुत किया। द्विघात (Quadratic) और त्रिघात (Cubic) समीकरणों का समाधान दिया। कूटक विधि जिसे दो संख्याओं का समांतर अनुपात निकालने की विधि है जिसे  (Diophantine Equation) का फल भी है । चक्रवाल विधि (Pell’s Equation) को हल करने की प्रणाली जो यूरोप में 17वीं शताब्दी में खोजी गई वह भारत में 12वीं शताब्दी में विकसित हो चुकी थी।

समीकरणों में ऋणात्मक मूलो को स्पष्ट रूप से प्रयोग किया। भास्कराचार्य ने अपनी पुत्री के नाम पर एक पुस्तक लीलावती लिखी। भास्कराचार्य का कार्य  (The History Of Mathematics) पुस्तक जो (David M Burton) द्वारा लिखी गई है, उसमें भी उल्लेखित है 

 

आर्यभट्टीय ग्रंथ में द्विघात समीकरण, त्रिकोणमिति और रेखीय समीकरण के समाधान प्रस्तुत है। ब्रह्मगुप्त 7वीं शताब्दी में ब्रह्मस्फुट सिद्धांत में उन्होंने ऋणात्मक संख्याओं, शून्य, अज्ञात राशि और द्विघात समीकरण की विधियां दी। उन्होंने दो अज्ञात राशियों वाले रेखीय समीकरण का हल बताया

 

यावत् तावत् तुल्यं यदि तभ्दवति तत् फलम्

 

जहां तक जितनी अज्ञात राशि है, उसे समान करके फल प्राप्त होता है।

गणितज्ञ श्रीधराचार्य (Sridharacharya) प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ थे, जिनका काल लगभग 8वीं से 10वीं शताब्दी माना जाता है। उन्होंने भी बीजगणित  के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

श्रीधराचार्य को मुख्यतः द्विघात समीकरण के हल के लिए प्रसिद्ध सूत्र देने का श्रेय दिया जाता है:

X =

 

यह सूत्र आज भी "श्रीधराचार्य सूत्र" के नाम से जाना जाता है।

बीजगणित भारत की एक मौलिक गणितीय खोज है। भारतीय गणितज्ञों ने प्रतिकों, अज्ञात राशियों, समीकरणों और विधियों के माध्यम से आधुनिक बीजगणित की नींव रखी। उनका योगदान आज भी गणित की जड़ों में विद्यमान है और भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिक दृष्टि को प्रमाणित करता है।

 

त्रिकोणमिति (Trigonometry) -

 

त्रिकोणमिति गणित की वह शाखा है जिसमें त्रिभुज की भुजाओं और कोणों में संबंध का अध्ययन किया जाता है।  भारतीय ज्योतिष शास्त्र एवं खगोल शास्त्र में इसका उपयोग ग्रहो के स्थान की गणना में होता था। प्राचीन गणितज्ञ आर्यभट्ट, वराहमिहिर तथा ब्रह् गुप्त आदि का त्रिकोणमिति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान है।

 

त्रिकोणमिति की संकल्पनाओं सूत्रों तथा सारणियों का वर्णन सूर्य सिद्धांत (400ई), वराहमिहिर के पंच सिद्धांत तथा ब्रह्मगुप्त के ब्रह्मस्फुट सिद्धांत (630ईस्वी) में मिलता है।

 

आर्यभट्ट (476 ईस्वी) में आर्यभट्टीय में उन्होंने पहली बार अर्द्धज्या (sine function का पूर्व रूप) की परिकल्पना की। ज्या, कोज्या, उत्क्रमज्या जैसे शब्दों का प्रयोग किया। 24 भागों में विभाजित 90° तक की ज्या सारणी प्रस्तुत की। 

माधव और उनके उत्तराधिकारियों जैसे ज्येष्ठदेव ने त्रिकोणमिति को श्रृंखला (Series) पद्धति से जोड़कर आधुनिक रूप दिया। (Sine) और (cosine) के लिए अनंत श्रेणियां (Infinite Series) विकसित की गई जो आज टेलर सीरीज के रूप में जानी जाती है। वर्तमान में पाइथागोरस के नाम से जो सिद्धांत प्रचलित है जो की बोधायन सूत्र पर आधारित है।


 

 

 

 

 

 

अर्थात समकोण त्रिभुज में आधार व लंब के वर्गों के योग के बराबर कर्ण की लंबाई का वर्ग है। 

 

भारतीय त्रिकोणमिति की जड़े खगोल शास्त्र और वैदिक गणित में है। भारत ने केवल त्रिकोणमिति को जन्म दिया, बल्कि इसकी सैद्धांतिक और व्यावहारिक नींव भी विश्व को दी। आज भारतीय शिक्षा प्रणाली में त्रिकोणमिति न केवल एक गणितीय विषय है बल्कि अनुसंधान, तकनीकी शिक्षा और प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं का भी मूल आधार है।

 

 


(गणित शास्त्र में आचार्य परंपरा)

 

आर्यभट्ट -

 

गणित शास्त्र का परम विकास तथा स्वर्णिम प्रगति आर्यभट्ट से प्रारंभ होती है। इनका जन्म पटना के पास कुसुमपुर में 476 ईस्वी में हुआ। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ जो आज भी उपलब्ध होता है वह है आर्यभट्टीयम्।

इसकी रचना पद्धति वैज्ञानिक है तथा यह चार भागों में विभाजित है, जिसमें से दो भाग गणित विषयक तथा खगोल विषयक है। इन्होंने अंकगणित, बीज गणित, ज्यामिति और त्रिकोणमिति के 33 सूत्र दिए हैं। 

उन्होंने स्थानिक मान प्रणाली (place value system) का उपयोग किया। 1 से 9 तक की संख्याओं के साथ शून्य (0) की अवधारणा को अपनाया (हालाँकीं शून्य का संकेत स्पष्ट नहीं दिया गया)।

बड़ी संख्याओं को संक्षेप में व्यक्त करने के लिए संस्कृत वर्णों के साथ गणितीय संख्याएं व्यक्त करने की विधि बताई। आर्यभट्ट ने पाई (π) का मान 3.1416 बताया, जो आधुनिक मान  के अत्यंत समीप है। ज्याकोज्या तथा उत्क्रमज्या जैसे त्रिकोणमिति फलनों की स्थापना की। आर्यभट्ट ने सरल समीकरणों (Linear equation) का हल तथा अज्ञात राशियों को हल करने की तकनीकी दी। 

 

आर्यभट्ट ने कहा

“पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है।“

 

यह एक क्रांतिकारी बात थी जब पूरी दुनिया पृथ्वी को स्थिर और सपाट मानती थी। उन्होंने बताया कि ग्रहण चंद्रमा या सूर्य पर छाया पड़ने से होता है, ना कि राहु केतु जैसे असुरों द्वारा।  दिन-रात, साल महीनों  की गणनाएं ग्रहों की गतियां, नक्षत्र की स्थिति। सब उन्होंने वैज्ञानिक पद्धति से समझाया। आर्यभट्ट भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रकाश स्तंभ हैं उनकी गणना, युक्तियां और वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने भारत को गणित और खगोल विज्ञान की विश्व गुरु स्थिति प्रदान की।

 

 

 

भास्कराचार्य -

 

सिद्धान्त शिरोमणि के रचयिता, विश्व विख्यात भास्कराचार्य का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था। इनका जन्म 1114 ई० में हुआ। 36 वर्ष की अवस्था में "सिद्धांत-शिरोमणि" की रचना की थी। उसमें गणिताध्याय और गोलाध्याय दो भाग है। उनकी दूसरी रचना लीलावती है, जिसमें अंक गणित, क्षेत्रफल, घनफल, ब्याज  आदि का विवरण है। लीलावती उनकी पुत्री का नाम था। इस पुस्तक में गणना को कथात्मक रूप में समझाने की कोशिश की है।

भास्कराचार्य का बीजगणित में भी महत्वपूर्ण योगदान है। द्विघात समीकरणों को हल करने की विधि, बीजगणित सूत्रों और प्रमेयों की स्पष्ट प्रस्तुति। ऋणात्मक और घातांक संख्याथों की चर्चा की। भास्कराचार्य ने गति और परिवर्तन की दर की व्याख्या की, जो आधुनिक (Calculus) की नींव मानी जाती है। उन्होंने "क्षय वृद्धि नियमान" (Rate Of Change) को समझाया- जो न्यूटन और लिबनिज के कैलकुलस से पहले का कार्य था।

भास्कराचार्य ने खगोलशास्त्र में भी योगदान दिया- उन्होंने  ग्रहों की गति की भविष्यवाणी की, चन्द्र व सूर्य ग्रहण की गणना, त्रिकोणमिति साराणियों का विकास में योगदान, पृथ्वी के झुकाव, दिन-रात के अंतर, वर्ष की गणना भी की।

सिद्धांत शिरोमणि 4 भागों में विभाजित है –

1.  लीलावती - अंकगणित (Arithmetic)

2.  बीजगणित - Algebra

3.  गोलाध्याय - खगोलशास्त्र (Spherical Astronomy)

4.  ग्रहगणित - ग्रहों की गति और गणना

भास्कराचार्य भारतीय ज्ञान परम्परा के अमूल्य रत्न है। उनका कार्य न केवल गणित और खगोल शास्त्र के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण है, बल्कि शिक्षा की शैली, भाषा की सरसता और वैदिक परम्परा की वैज्ञानिकला का सुन्दर उदाहण भी  है।

ब्रह्मगुप्त—

 

ज्योतिष व गणित शास्त्र के महान विद्वान ब्रह्मगुप्त का जन्म राजस्थान के भीनमाल नामक स्थल में 598 ई० में हुआ था। इन्होंने ब्रह्मस्फुट सिद्धांत और खंड खाद्य की रचना की है। अरब देशवासियों को गणित व ज्योतिष का ज्ञान सबले यहते बहमगुप्त के ग्रन्थों से ही मिलता है।

ब्रह्मगुप्त ने पहली बार शून्य को एक स्वतंत्र संख्या के रूप में परिभाषित किया। उन्होने शून्य के साथ जोड, घटाव, गुणा और भाग के नियम दिए। ब्रह्मगुप्त ने ऋणात्मक (Negative) संख्याओं को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया। उन्होंने बताया कि ऋ‌णात्मक और धनात्मक संख्याओं का व्यवहार किस प्रकार होता है। उन्होने द्विघात समीकरणों (Quadratic Equation) को हल करने की विधि बताएं। अज्ञात राशियों के साथ संख्यात्मक समीकरण सुलझाने की तकनीक दी। ब्रह्मगुप्त ने एक खास प्रकार का समीकरण बताया जिसे आज हम (Pell’s Equation) कहते हैं जिसे बाद में यूरोपीय गणितज्ञों ने अपनाया। 

ब्रह्मगुप्त ने खगोल शास्त्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने ग्रहों की गति, कक्षा और स्थिति की गणना, चंद्रमा, सूर्य ग्रहण की गणना की विधियां दी। साथ ही साथ समय मापन, दिन-रात की लंबाई, नक्षत्र की स्थिति और खगोलीय घटनाओं की भविष्यवाणी की। 

ब्रह्मगुप्त ने त्रिभुज और चतुर्भुज के क्षेत्रफल निकालने का सूत्र दिया। वृत्त और चाप, त्रिज्या, व्यास और परिमिती के गणितीय संबंध बताया। उन्होंने खंड खाद्य एक और खगोलशास्त्रीय ग्रंथ, जिसे ग्रहों की गणना, कलन और यंत्रों का उल्लेख है। 

ब्रह्मगुप्त ने भारतीय गणित को शून्य, ऋणात्मक संख्या, बीजगणित और खगोल के क्षेत्र में एक वैज्ञानिक और तार्किक शिक्षा दी। वे गणित को संख्याओं और प्रतीकों से जोड़ने वाले पहले वैज्ञानिक में से एक थे। उनका योगदान न केवल भारत बल्कि समस्त विश्व की गणितीय परंपरा की नींव में समाहित है।

 

श्रीनिवास रामानुजन —

 

श्रीनिवास रामानुजन की गणितीय देन अत्यंत प्रेरणादायक, अद्वितीय और गहराई से स्पर्श करने वाली है। वे 20वीं शताब्दी के ऐसे विश्वविख्यात गणितज्ञ थे, जिन्होंने गणित के अनेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी योगदान दिया और मानव ज्ञान की सीमाओं को विस्तारित किया।

रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु के एरोड नामक स्थान में हुआ था। आश्चर्यजनक रूप से, उन्होंने किसी औपचारिक उच्च शिक्षा के बिना, मात्र आत्म-अध्ययन के बल पर गणित के जटिलतम सिद्धांतों में निपुणता प्राप्त की। यह तथ्य ही उन्हें विशेष बनाता है कि उन्होंने अपने ज्ञान का उद्गम कहीं बाहर से नहीं, बल्कि आत्मा की अंतरतम प्रेरणा से प्राप्त किया।

 

संख्याओं और श्रेणियों (Series) के क्षेत्र में उन्होंने ऐसे विलक्षण सूत्र खोज निकाले, जो उस समय की गणितीय समझ से परे थे। विशेष रूप से अनंत श्रेणियों (Infinite Series) के लिए उनके द्वारा प्रस्तुत नए प्रकार के सूत्र, आज भी गणितज्ञों को चमत्कृत करते हैं। संख्या सिद्धांत (Number Theory) में भी उनका योगदान अत्यंत उल्लेखनीय रहा। उन्होंने विभाजन फलन (Partition Function) पर अद्भुत कार्य किया— जैसे कि किसी संख्या को कितने तरीकों से संख्याओं के योग के रूप में विभाजित किया जा सकता है, इस पर उन्होंने गहन शोध प्रस्तुत किया।

 

रामानुजन की प्रतिभा का एक रोचक उदाहरण है — "रामानुजन टैक्सी संख्या" (1729)। यह वह सबसे छोटी संख्या है जिसे दो घनों के योग के रूप में दो विभिन्न तरीकों से लिखा जा सकता है:



यह एक सामान्य संख्या नहीं, बल्कि उनकी अंतर्दृष्टि और गूढ़ गणनात्मक संवेदना का प्रतीक बन गई।

उनके द्वारा खोजे गए रामानुजन थीटा फलन (Theta Function), τ-फलन (tau function और रामानुजन संचयी श्रेणियाँ (Mock Theta Series) आज भी आधुनिक गणित, भौतिकी और क्रिप्टोग्राफी जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान का केंद्र बने हुए हैं। ब्लैक होल सिद्धांत, स्ट्रिंग थ्योरी और डेटा एन्क्रिप्शन जैसे जटिल विषयों में इनका प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यह आश्चर्य की बात है कि उनके जीवन के अंतिम वर्षों में विकसित ये फलन आज तक पूरी तरह से समझे नहीं जा सके हैं।

 

रामानुजन के गणितीय योगदान की गहराई और व्यापकता उनके कई अन्य सूत्रों और अवधारणाओं में परिलक्षित होती है। उनकी नोटबुक हजारों अप्रमाणित परिणामों से भरी हुई थीं, जिनमें से कई को बाद में गणितज्ञों ने सही साबित किया। यह उनके सहज ज्ञान और अद्वितीय अंतर्दृष्टि का प्रमाण है।

 

रामानुजन स्वयं कहा करते थे —

गणित के हर सूत्र में मुझे ईश्वर का दर्शन होता है।”

यह कोई मात्र वाक्य नहीं, बल्कि उनकी गणितीय साधना का आध्यात्मिक आलंबन था। उनकी रचनात्मकता कल्पना, अन्तःप्रेरणा और विशुद्ध अंतर्दृष्टि का अद्वितीय संगम थी। उन्होंने हजारों गणितीय सूत्र बिना किसी पारंपरिक प्रमाण के प्रस्तुत किए, जिनमें से अधिकांश को बाद में आधुनिक गणितज्ञों द्वारा सही ठहराया गया। यह उनकी प्रतिभा की प्रामाणिकता का प्रमाण है।

 

श्रीनिवास रामानुजन की प्रतिभा को विश्व के समक्ष लाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बना — इंग्लैंड के महान गणितज्ञ जी. एच. हार्डी। जब रामानुजन ने उन्हें अपने गणितीय पत्र भेजे, तो हार्डी उनके अद्वितीय कौशल से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय बुलाया। वहीं रहते हुए रामानुजन ने कई महत्वपूर्ण शोध कार्य किए और भारतीय गणितीय परंपरा को वैश्विक प्रतिष्ठा दिलाई।

 

आज उनके नाम पर रामानुजन जर्नल, रामानुजन संस्थान (चेन्नई), तथा अनेक पुरस्कार और व्याख्यान आयोजित होते हैं। उनका जीवन केवल गणित की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्म-शक्ति और रचनात्मक चेतना का प्रतीक है।

 

रामानुजन ने न केवल गणित की दिशा को परिवर्तित किया, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि यदि भीतर से प्रेरणा सच्ची हो और आत्मज्ञान की ज्वाला प्रज्वलित हो, तो औपचारिक शिक्षा की सीमाएं भी प्रतिभा के मार्ग में बाधा नहीं बन सकतीं। उनका जीवन स्वयं में एक ज्वलंत घोषणा है कि भारतीय ज्ञान परंपरा किसी भी युग में अपनी आभा बिखेरने में सक्षम है।

 

अतः निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है, भारत में महान गणितज्ञ हुए और संपूर्ण विश्व में एक अमिट छाप छोड़ी तथा भारत को विश्व गुरु बनाया। हमारे गणितज्ञ केवल गणित में ही नहीं बल्कि खगोल विज्ञान और पदार्थ विज्ञान में भी कार्य किया। कणाद ने सर्वप्रथम सबसे सूक्ष्मतम कण परमाणु का सिद्धांत दिया तथा बताया कि यह अभिभाज्य कण है। गुरुत्वाकर्षण को भी सर्वप्रथम भारत में ही खोजा गया। आज जो फिबोनाची श्रेणी ( fibonacci series) विश्व भर में पढ़ाई जाती है, उसकी नींव सर्वप्रथम भारत में आचार्य पिंगल ने रखी थी। यह स्वयं  पश्चात गणितज्ञों ने भी माना है।

भारत ने विश्व को गणित के साथ-साथ विज्ञान, खगोल शास्त्र का भी ज्ञान दिया। भारतीय ज्ञान परंपरा की यह विलक्षण देन महान है। भारत को भले ही अपने द्वारा किए कार्यों का श्रेय नहीं मिला, लेकिन अब संपूर्ण विश्व भी मानता है कि सर्वप्रथम खोजें भारत मे हुई है। इसके लिए अति आवश्यक है कि हम अपनी ज्ञान परंपरा को समझें तथा इसे अपनी शिक्षा व्यवस्था में भी शामिल करें। जिससे सबको अपने विरासत पर गर्व हो।

 


सहायक ग्रंथों की सूची

(List of Supplementary Texts)

 

भारतीय दर्शन एवं संस्कृति -

1.  Indian Philosophy – Volume 1 & 2 (VAL 182) - S. Radhakrishnan

2.  भारतीय दर्शनशास्त्रआचार्य बलदेव उपाध्याय

3.  भारतीय दर्शन की रूपरेखाप्रो. हरेंद्र प्रसाद सिन्हा

4.  भारत की ज्ञान प्रणालीडॉ. नरेंद्र कुमार पांडेय

5.  भारतीय ज्ञान परम्परा – NCERT

6.  The Knowledge Traditions and Practices of India – Kapil Kapoor (CBSE / भारतीय विद्या भवन)

7.  Foundations of Indian Culture – Sri Aurobindo

8.  संस्कृत वांग्मयी - NCERT

 

वैदिक अध्ययन एवं विज्ञान का इतिहास -

1.  Vedic Cosmology – Stephen Knapp

2.  भारत का वैज्ञानिक इतिहास – CSIR & NBT द्वारा प्रकाशित

3.  संस्कृत में विज्ञानडॉ. विद्याधर शर्मा गुलेरी

 

 

गणित का इतिहास एवं विशिष्ट योगदान

1.  History of Mathematics – David M. Burton

2.  Mathematics and its history - John Stillwell

3.  Ramanujan: The Man Who Knew Infinity – Robert Kanigel

4.  प्राचीन भारत में गणितडॉ. भगवत दत्त

 

भारतीय शिक्षा का इतिहास

1.  भारतीय शिक्षा का इतिहासडॉ. रामशंकर अवस्थी

 

ऑनलाइन स्रोत / Online Resources

1.  Indian National Science Academy (INSA) Archives

2.  Digital Library of India – Rare books in Sanskrit & Mathematics

3.  https://iksindia.org – Indian Knowledge System Division, AICTE

4.  https://bhartiyavidya.com

5.  https://ncert.nic.in – IKS Textbooks and Resources

6.  International Journal of Enhanced Research in Educational Development (IJERED)डॉ. सावित्री परिहार, श्रीमती प्रज्ञा चौहान

 

 

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